Tips and Tricks: गांवों में बर्तनों की सफ़ाई के लिए अपनाया जाने वाला चूल्हे की राख और धान की भूसी का पारंपरिक तरीका बेहद सस्ता, प्राकृतिक और सुरक्षित माना जाता है. दादी-नानी के समय से राख में पानी मिलाकर बनाए गए पेस्ट से पीतल, तांबा और स्टील के बर्तनों की चिकनाई और कालिख आसानी से हटाई जाती रही है. राख के प्राकृतिक क्षारीय गुण और भूसी की हल्की रगड़ बर्तनों को बिना किसी रसायन के आईने जैसी चमक देती है.
आमतौर पर देखा जाता है कि घर के किचन में बर्तन साफ़ करने पर सबसे ज़्यादा खर्च होता है और हर कुछ दिनों में बर्तन धोने का डिटर्जेंट भी खत्म हो जाता है, जिसके चलते हफ्ते-दर-हफ्ते नया डिटर्जेंट खरीदना पड़ता है. वहीं यदि ग्रामीण क्षेत्रों की बात की जाए, तो वहाँ बर्तनों की सफ़ाई के लिए पारंपरिक तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है. पहले गांवों में महिलाएं चूल्हे की राख और धान की भूसी से बर्तन साफ़ करती थीं और उन्हें आईने जैसी चमक देती थी. यह तरीका न केवल बेहद सस्ता था, बल्कि पूरी तरह प्राकृतिक और स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित भी माना जाता था. इसमें किसी प्रकार के रसायन का उपयोग नहीं होता था, जिससे हाथों और त्वचा को कोई नुकसान नहीं पहुंचता था.

पुराने समय में हमारी दादी-नानी चूल्हे में जलने वाली लकड़ी और उपलों से निकलने वाली राख को कभी बेकार नहीं समझती थी. यही राख उनके घरेलू कामकाज में सबसे अधिक उपयोगी मानी जाती थी. बर्तन साफ़ करने के लिए दादी-नानी के समय से ही महिलाएं राख में थोड़ा पानी मिलाकर गाढ़ा पेस्ट तैयार करती थी. इस पेस्ट को पीतल, तांबे या स्टील के बर्तनों पर लगाकर हाथों या भूसी की मदद से रगड़ा जाता था. कुछ ही मिनटों में बर्तनों पर जमी चिकनाई और कालिख साफ़ हो जाती थी और बर्तन बिल्कुल नए जैसे चमकने लगते थे.

राख में मौजूद प्राकृतिक क्षारीय तत्व और उसकी हल्की खुरदुरी बनावट बर्तनों पर जमी गंदगी को हटाने में बेहद कारगर होती है. यह चिकनाई को काटने का काम करती है, जिससे बर्तन आसानी से साफ हो जाते हैं. इस प्रक्रिया में न तो हाथ जलते हैं और न ही त्वचा को किसी प्रकार की एलर्जी या नुकसान होता है. यही कारण है कि इसे पूरी तरह सुरक्षित तरीका माना जाता था, ग्रामीण महिलाएं रोज़मर्रा के कामों में इसी सरल और आसान विधि का उपयोग करके अपने बर्तनों को साफ़ रखती थी.
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बर्तनों की सफ़ाई के लिए सबसे पहले चूल्हे से जली हुई साफ़ राख निकाल ली जाती है और उसमें आवश्यकता अनुसार पानी मिलाकर पेस्ट तैयार किया जाता है. इसके बाद बर्तनों को हल्का-सा भिगो लिया जाता है, ताकि उन पर जमी गंदगी नरम हो जाए. फिर उस पेस्ट को बर्तनों पर लगाकर धान से निकली हुई भूसी से रगड़ा जाता है. भूसी की रगड़ से जमा हुआ कचरा और तेल आसानी से निकल जाता है और बर्तन पूरी तरह साफ़ हो जाते हैं.

राख और भूसी से सफ़ाई करते समय इस बात का ध्यान रखना ज़रूरी होता है कि पेस्ट लगे बर्तनों को सूखने के लिए न छोड़ा जाए. यदि पेस्ट लगाकर बर्तन रख दिए जाएँ, तो राख बर्तनों पर चिपक सकती है, जिससे बाद में उन्हें साफ़ करना मुश्किल हो जाता है. सही तरीका यह है कि पेस्ट लगाते ही बर्तनों को गर्म पानी से धो लिया जाए. गर्म पानी से धुलाई करने पर बर्तनों में और अधिक चमक आती है और वे लंबे समय तक साफ़ बने रहते हैं.

धान की भूसी और चूल्हे की राख से गंदे से गंदे बर्तन भी आसानी से साफ़ हो जाते हैं. खासतौर पर पीतल के बर्तन, जिनकी सफ़ाई आज के समय में काफ़ी कठिन मानी जाती है, इस विधि से बेहद आसानी से चमक उठते हैं. यह पारंपरिक तरीका न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि खर्च बचाने वाला भी है.
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