2008 में हाईकोर्ट ने दोनों दोषियों की मौत की सजा को बरकरार रखा और इसके बाद 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इस सजा को कायम रखा। इसके बाद वर्षों तक दया याचिकाओं, पुनर्विचार याचिकाओं और संवैधानिक याचिकाओं की एक लंबी श्रृंखला चलती रही। इस दौरान दोषियों ने गंभीर आरोप लगाए कि उन्हें लंबे समय तक अवैध एकांत कारावास में रखा गया और उनकी दया याचिकाओं के निपटारे में अत्यधिक देरी की गई।
हाईकोर्ट ने कहा कि अगर दया याचिकाओं पर फैसला करने में बेवजह देरी हो, कैदियों को अवैध रूप से अकेले रखा जाए या उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया जाए, तो इसे गंभीर परिस्थिति माना जाएगा। ऐसे मामलों में मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला जा सकता है।
मानवीय और संवैधानिक तरीके से व्यवहार किया जाए
अदालत ने रिकॉर्ड देखकर पाया कि दोषियों को सुप्रीम कोर्ट के नियमों के खिलाफ, लंबे समय तक दूसरे कैदियों से अलग रखा गया था। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि दया याचिका पर अंतिम फैसला आने से पहले किसी दोषी को फांसी की कोठरी में रखना या अलग-थलग करना कानून के खिलाफ है।
अदालत ने यह भी माना कि दया याचिकाओं पर फैसले में देरी और उसके बारे में दोषियों को समय पर जानकारी न देना, मानसिक पीड़ा देता है और यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि अपराध भले ही बहुत गंभीर और समाज को झकझोरने वाला हो, लेकिन मौत की सजा के बाद भी राज्य का कर्तव्य है कि दोषियों के साथ मानवीय और संवैधानिक तरीके से व्यवहार किया जाए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दोषियों के अधिकारों की रक्षा करने से पीड़ित का दर्द कम नहीं होता, बल्कि इससे कानून और संविधान की मजबूती दिखती है। इन सभी कारणों को देखते हुए हाईकोर्ट ने दोषियों की मौत की सजा को उनके पूरे जीवन के लिए आजीवन कारावास में बदल दिया। साथ ही यह भी कहा कि इस सजा में उन्हें सामान्य रिहाई या अपने आप छूट मिलने का कोई अधिकार नहीं होगा।
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