महाशिवरात्रि के दिन बाबा बैद्यनाथधाम में भगवान शिव और मां पार्वती के विवाह उत्सव की भव्य झलक देखने को मिलती है.सिंदूरदान से लेकर वर को मोर मुकुट पहनाने तक, हर रस्म शास्त्रों के अनुसार निभाई जाती है.
पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में वर्णित कथा के अनुसार, जब माता सती ने दक्ष यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए थे, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे. इसी दौरान माता सती के शरीर के विभिन्न अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे,मान्यता है कि देवघर में माता सती का हृदय गिरा था, इसी वजह से इस स्थान को हृदय पीठ भी कहा जाता है. इस मान्यता के कारण बैद्यनाथधाम का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है.
मनोकामना लिंग से भी जाना है यह ज्योतिर्लिंग:
बाबा बैद्यनाथधाम को मनोकामना लिंग के नाम से भी जाना जाता है.ऐसा विश्वास है कि जो भी भक्त सच्चे मन और पूर्ण श्रद्धा के साथ यहां पूजा-अर्चना करता है, उसकी हर मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है. यही वजह है कि साल भर देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं.खासकर सावन माह और महाशिवरात्रि के अवसर पर यह धाम आस्था का महासागर बन जाता है.
महाशिवरात्रि के दिन इस ज्योतिर्लिंग मै शादी की हर रश्म निभाई
महाशिवरात्रि के दिन बाबा बैद्यनाथधाम में विशेष धार्मिक अनुष्ठान और उत्सव का आयोजन किया जाता है.इस पावन तिथि पर भगवान शिव और मां पार्वती की विधि-विधान से पूजा होती है. रात के समय यहां शिव-पार्वती विवाह उत्सव का भव्य आयोजन किया जाता है, जिसमें वे सभी रस्में निभाई जाती हैं, जो एक सामान्य विवाह में होती हैं.चाहे वह सिंदूरदान हो, वर को मोर मुकुट पहनाना हो या अन्य वैवाहिक परंपराएं—हर रस्म पूरे श्रद्धा भाव से संपन्न की जाती है.
चार प्रहर मै की जाती है पूजा आराधन
महाशिवरात्रि के दिन चार प्रहर में भगवान शिव और मां पार्वती की षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना की जाती है.इस दौरान अभिषेक, आरती और मंत्रोच्चार से पूरा मंदिर परिसर भक्तिमय हो उठता है.श्रद्धालुओं का मानना है कि इस दिन की गई पूजा से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि का वरदान प्राप्त होता है.यही कारण है कि बाबा बैद्यनाथधाम न केवल एक तीर्थ, बल्कि करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र बना हुआ है.
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