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Wheat Harvest Farming Tips: गेहूं की कटाई के बाद कई किसान खेत में बची पराली को जला देते हैं, लेकिन यह तरीका मिट्टी की उर्वरता को नुकसान पहुंचाता है और पर्यावरण को भी प्रदूषित करता है. कृषि विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने की बजाय किसान बेहतर विकल्प अपना सकते हैं. पराली को खेत में ही मिलाकर जैविक खाद बनाया जा सकता है या मशीनों की मदद से उसका प्रबंधन किया जा सकता है. इससे मिट्टी की गुणवत्ता बेहतर होती है और अगली फसल के लिए पोषक तत्व भी बढ़ते हैं. सही तकनीक अपनाकर किसान नुकसान से बच सकते हैं और खेती को अधिक लाभकारी बना सकते हैं.
भीलवाड़ा: आधुनिक समय में कृषि कार्यों में तकनीक का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है. मजदूरों की कमी को देखते हुए किसान अब कंबाइन मशीनों का अधिक इस्तेमाल कर रहे हैं, जिससे फसल की कटाई और मड़ाई जल्दी हो जाती है. हालांकि इस सुविधा के साथ कुछ गंभीर समस्याएं भी सामने आ रही हैं. गेहूं की कटाई के बाद खेतों में बची पराली या पराती को कई किसान खेत में ही जला देते हैं, जो खेती और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है. पराली जलाने से मिट्टी की उर्वरता घटती है और खेत की उत्पादकता पर भी इसका सीधा असर पड़ता है. साथ ही इससे निकलने वाला धुआं वातावरण को प्रदूषित करता है और लोगों के स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है.

ग्रामीण क्षेत्रों में मजदूरों की लगातार कमी के कारण किसान आधुनिक मशीनों पर निर्भर होते जा रहे हैं. गेहूं की कटाई और मड़ाई के लिए कंबाइन हार्वेस्टर का उपयोग तेजी से बढ़ा है. हर साल पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों से कई हार्वेस्टर मशीनें भीलवाड़ा और आसपास के जिलों में आती हैं और किसान इनसे अपनी फसल कटवाते हैं. मशीनों के उपयोग से काम जल्दी और आसानी से हो जाता है, लेकिन इसका एक बड़ा नुकसान यह है कि खेतों में काफी मात्रा में फसल अवशेष बच जाता है. पहले मजदूरों द्वारा कटाई करने पर भूसा पशुओं के चारे के रूप में घर पहुंच जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं हो पा रहा है. इसके चलते एक ओर पशुओं के चारे का संकट बढ़ रहा है, वहीं किसान अवशेष हटाने के लिए उसे जलाने का रास्ता अपनाने लगे हैं.

कृषि पर्यवेक्षक कजोड़ मल ने बताया कि खेतों में पराली या पराती जलाने से मिट्टी के कई महत्वपूर्ण पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं. जब किसान खेत में अवशेष जलाते हैं तो उसके साथ मिट्टी में मौजूद जीवांश और सूक्ष्म जीव भी नष्ट हो जाते हैं. ये सूक्ष्म बैक्टीरिया मिट्टी के भीतर कार्बनिक पदार्थों को सड़ाकर पौधों के लिए पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं. इनके खत्म होने से मिट्टी की उर्वरता धीरे-धीरे कम होने लगती है और फसलों को संतुलित पोषण नहीं मिल पाता. इसके अलावा पराली जलाने से मिट्टी में कार्बन की मात्रा भी घटती है. वैज्ञानिकों के अनुसार मिट्टी में कार्बन की मात्रा लगभग 6 से 8 प्रतिशत होनी चाहिए, लेकिन लगातार अवशेष जलाने के कारण कई जगह यह घटकर करीब 2 प्रतिशत तक रह गई है.
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पराली जलाने से केवल मिट्टी ही नहीं, बल्कि पर्यावरण को भी गंभीर नुकसान पहुंचता है. खेतों में आग लगाने से बड़ी मात्रा में धुआं और जहरीली गैसें वातावरण में फैलती हैं, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता है. इसका असर इंसानों के साथ-साथ पशु-पक्षियों और आसपास के पर्यावरण पर भी पड़ता है. धुएं के कारण सांस से जुड़ी बीमारियां बढ़ने का खतरा रहता है और कई बार सड़क पर धुंध जैसी स्थिति बनने से दुर्घटनाओं की संभावना भी बढ़ जाती है. इसके अलावा खेतों में लगी आग कई बार आसपास के पेड़ों, बिजली के खंभों या अन्य खेतों तक भी फैल सकती है, जिससे बड़ी दुर्घटनाएं हो सकती हैं. इसलिए कृषि विभाग और विशेषज्ञ लगातार किसानों को पराली न जलाने की सलाह देते रहते हैं.

कृषि पर्यवेक्षक कजोड़ मल ने बताया कि पराली जलाने की बजाय किसान इसे खेत में ही खाद के रूप में उपयोग कर सकते हैं. इसके लिए कटाई के बाद खेत में पड़े अवशेषों को डिस्क हैरो या रोटावेटर की मदद से मिट्टी में मिला देना चाहिए. इसके बाद प्रति एकड़ खेत में लगभग आठ किलोग्राम यूरिया डालकर हल्की सिंचाई कर दी जाए, तो कुछ ही समय में यह अवशेष सड़कर जैविक खाद में बदल जाते हैं. इससे मिट्टी में जीवांश और कार्बन की मात्रा बढ़ती है और खेत की उर्वरता भी बेहतर होती है. इस तरीके से किसान अपनी भूमि की गुणवत्ता को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं और पर्यावरण को भी प्रदूषण से बचाया जा सकता है.
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