संघर्षों के बीच शुरू हुआ सफर
मांझी समाज की रतनी नाग ने लोकल 18 को बताया, उनका जीवन शुरू से ही संघर्षों से भरा रहा. उनके समाज में आज भी शिक्षा को लेकर जागरूकता बहुत कम है. अधिकतर परिवार बच्चों को मुश्किल से पांचवीं तक पढ़ा देते हैं और आगे की पढ़ाई को लेकर कोई स्पष्ट योजना नहीं बनाते. ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर यही सोच रहती है कि सरकारी स्कूल में पांचवीं तक पढ़ लेना ही काफी है, लेकिन रतनी नाग ने इस सोच को बदलने का फैसला किया.
घने जंगल से होकर रोज पैदल जाती थीं स्कूल
रतनी नाग बताती हैं कि जब वह 6वीं कक्षा में पढ़ती थीं, तब अपने गांव बरडाडपारा (बरिमा पंचायत) से नर्मदापुर तक रोज पैदल स्कूल जाती थीं. स्कूल के रास्ते में घना जंगल पड़ता था, जिससे उन्हें काफी डर भी लगता था, लेकिन पढ़ाई के प्रति उनकी लगन इतनी मजबूत थी कि वे हर दिन डर के बावजूद स्कूल पहुंचती थीं.
प्री-मैट्रिक हॉस्टल से मिला सहारा
इसी दौरान नर्मदापुर में प्री-मैट्रिक हॉस्टल शुरू हुआ. हॉस्टल की अधीक्षिका स्कूल आकर बच्चों को वहां रहने और पढ़ाई करने के लिए प्रेरित करती थीं. उन्होंने बताया कि हॉस्टल में रहने, खाने-पीने और रोजमर्रा की जरूरतों की सभी चीजें मुफ्त मिलेंगी. यह सुनकर रतनी नाग ने भी हॉस्टल में प्रवेश ले लिया और वहीं रहकर दसवीं तक की पढ़ाई पूरी की.
200 रुपये की कमी से एक साल रुकी पढ़ाई
दसवीं के बाद उन्होंने ग्यारहवीं और बारहवीं की पढ़ाई अपनी बड़ी मां के घर रहकर पूरी की. इसके बाद वे डीसीए करने के लिए सीतापुर जाना चाहती थीं, लेकिन आर्थिक तंगी उनके सामने बड़ी बाधा बन गई. कॉलेज में एडमिशन के लिए करीब 1500 रुपये की जरूरत थी, लेकिन घर की हालत ऐसी थी कि यह रकम भी जुटाना मुश्किल हो गया. यहां तक कि मात्र 200 रुपये की कमी के कारण उनकी पढ़ाई एक साल तक रुक गई.
वेदांता की ट्रेनिंग से मिली नई राह
इसी बीच उन्हें वेदांता द्वारा संचालित कौशल विकास योजना के बारे में पता चला. उनके पिता कहीं से एक पंपलेट लेकर आए थे, जिसमें मुफ्त ट्रेनिंग, रहने-खाने की व्यवस्था और नौकरी दिलाने की जानकारी दी गई थी. उस समय उनके पास मोबाइल भी नहीं था, इसलिए उन्होंने सरपंच के कीपैड मोबाइल से फोन कर पूरी जानकारी ली. उन्हें पता चला कि कोरबा के बालको में होटल मैनेजमेंट सहित कई कोर्स की ट्रेनिंग दी जाती है.
कागज पर नक्शा बनाकर पहुंचीं कोरबा
कोरबा तक पहुंचना भी उनके लिए आसान नहीं था. उन्होंने कागज पर पूरा रास्ता लिख लिया, कहां उतरना है, कहां से बस पकड़नी है, सब नोट कर लिया. आखिरकार वे बालको पहुंचीं और होटल मैनेजमेंट की ट्रेनिंग शुरू की. करीब 45 दिन के प्रशिक्षण के बाद उनका प्लेसमेंट बिलासपुर के इंटरसिटी इंटरनेशनल होटल में वेटर के रूप में हुआ.
नौकरी के साथ जारी रखी पढ़ाई
नौकरी करते हुए भी रतनी ने पढ़ाई नहीं छोड़ी. वे सीतापुर के श्यामा प्रसाद मुखर्जी कॉलेज से प्राइवेट पढ़ाई करती रहीं. कई बार नौकरी और पढ़ाई को साथ संभालना बहुत कठिन हो जाता था. एक बार परीक्षा के लिए छुट्टी नहीं मिलने पर उन्होंने नौकरी छोड़ दी. परीक्षा देने चली गईं. इसके बाद रायपुर के मैग्नेटो मॉल के पास स्थित मौसा जी रेस्टोरेंट एंड स्वीट्स में इंटरव्यू दिया और वहां काम करते हुए अपनी पढ़ाई जारी रखी. उन्होंने प्राइवेट तरीके से फर्स्ट ईयर, सेकंड ईयर और फाइनल ईयर की पढ़ाई पूरी की और अंततः स्नातक की डिग्री हासिल कर ली.
वकालत बना लक्ष्य
पढ़ाई के दौरान ही उनके मन में वकालत करने का सपना जागा. उन्हें लगा कि काला कोट पहनकर न्याय के लिए लड़ने की ताकत मिलती है. समाज के लोगों को तहसील और एसडीएम कार्यालय के चक्कर लगाते हुए परेशान होते देखकर उन्होंने कानून की पढ़ाई करने का निर्णय लिया. कानून की पढ़ाई के दौरान उनकी दिनचर्या बेहद कठिन थी. सुबह 5 बजे उठकर जुम्बा और एरोबिक्स की क्लास जाती थीं. फिर सुबह 8:30 बजे से कॉलेज में पढ़ाई. दोपहर करीब 1 बजे से रात 12:30 बजे तक रेस्टोरेंट में नौकरी. इसके बाद रात 1-2 बजे तक पढ़ाई करती थीं. केवल तीन-चार घंटे की नींद लेकर अगले दिन फिर वही दिनचर्या शुरू हो जाती थी. यह सिलसिला करीब छह साल तक चलता रहा. एलएलबी की पढ़ाई पूरी की. फिर एलएलएम किया. इसके बाद 2021 में इंडियन बार एग्जामिनेशन पास कर वकालत का लाइसेंस प्राप्त किया.
राजनीति में रखा कदम
वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद रतनी अपने क्षेत्र वापस आ गईं. इसी दौरान लोगों ने उन्हें जिला पंचायत सदस्य (डीडीसी) का चुनाव लड़ने की सलाह दी. शुरुआत में कुछ लोगों ने मना भी किया, लेकिन उन्होंने तय किया कि अगर समाज के लिए कुछ करना है तो राजनीति में आना जरूरी है. रतनी चुनाव मैदान में उतरकर पूरी मजबूती से प्रचार किया. लोगों का भरपूर समर्थन मिला और वे चुनाव जीत गईं. आज वे जिला पंचायत सदस्य के रूप में महिला, बाल विकास और स्वास्थ्य समिति की सदस्य हैं और समाज के विकास के लिए काम कर रही हैं.
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