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Watermelon Farming Tips: गर्मियों में तरबूज और खरबूज की मांग अधिक रहती है, इसलिए यह किसानों के लिए कम समय में मुनाफा देने वाली फसल मानी जाती है. एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग चौधरी के अनुसार फरवरी से मार्च का समय इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त होता है. यह फसल बलुई, बलुई दोमट और दोमट मिट्टी में अच्छी पैदावार देती है. हालांकि थ्रिप्स, सफेद मक्खी, माहू और फल मक्खी जैसे कीट फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इनसे बचाव के लिए 1500 पीपीएम नीम तेल का 15 दिन के अंतराल पर छिड़काव और खेत में येलो स्टिकी ट्रैप लगाना प्रभावी तरीका माना जाता है.
गर्मियों के मौसम में तरबूज और खरबूज सबसे ज्यादा खाए जाने वाला फल होता है. ये फल शरीर को ठंडक देते हैं और पानी की कमी को भी पूरा करते हैं. बाजार में इनकी मांग हमेशा बनी रहती है, इसलिए किसानों के लिए यह फसल काफी फायदेमंद मानी जाती है. तरबूज और खरबूज लगभग 60 से 70 दिनों में तैयार हो जाते हैं. लेकिन कम समय में ज्यादा मुनाफा देने वाली इस फसल में सबसे बड़ी समस्या होती है कीट रोगों की. अगर समय पर किसान शुरुआत से ही सही देखभाल करें और कीट-रोगों पर नियंत्रण रखें तो कम समय में अच्छा उत्पादन और बढ़िया मुनाफा कमा सकते हैं.

एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग चौधरी ने बताया कि फरवरी से मार्च का महीना तरबूज और खरबूजे की खेती के लिए सबसे अच्छा समय माना जाता है. तरबूज और खरबूज की खेती बलुई मिट्टी, बलुई दोमट और दोमट मिट्टी में अच्छी होती है. इन मिट्टियों में पानी का निकास बेहतर रहता है जिससे पौधों की जड़ें स्वस्थ रहती हैं और पौधे तेजी से बढ़ते हैं. हालांकि कई बार मिट्टी में मौजूद कीट और रोग फसल को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इसलिए आईए जानते हैं तरबूज और खरबूजे को कीट रोगों से बचाने के उपाय.

उन्होंने बताया कि तरबूज और खरबूज की फसल में कई बार रस चूसने वाले कीट बड़ी समस्या बन जाते हैं. जब पौधों में 2 से 5 पत्तियां निकलती हैं, उसी समय ये कीट हमला करना शुरू कर देते हैं. इनमें मुख्य रूप से थ्रिप्स, सफेद मक्खी और माहू शामिल हैं. ये कीट पौधों का रस चूस लेते हैं जिससे पत्तियां कमजोर होकर पीली पड़ने लगती हैं और सूख सकती हैं. अगर समय रहते इन पर नियंत्रण न किया जाए तो पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पूरी फसल प्रभावित हो सकती है.
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इसके अलावा तरबूज और खरबूज की खेती में फल मक्खी और लीफ माइनर भी गंभीर समस्या बन सकते हैं. फल मक्खी छोटे फलों पर डंक मारती है, जिससे फल सड़ने लगते हैं या उन पर दाग पड़ जाते हैं. वहीं लीफ माइनर पत्तियों के अंदर सुरंग बनाकर उन्हें नुकसान पहुंचाता है. इससे पत्तियां सूख जाती हैं और पौधे कमजोर हो जाते हैं. ऐसी स्थिति में फल का आकार और गुणवत्ता भी प्रभावित होती है, जिससे किसानों को बाजार में अच्छा दाम नहीं मिल पाता.

एग्रीकल्चर एक्सपर्ट बजरंग चौधरी ने बताया कि तरबूज और खरबूज की फसल को थ्रिप्स, सफेद मक्खी और फल मक्खी से बचाने के लिए नीम का तेल काफी असरदार होता है. किसान 1500 पीपीएम नीम तेल का 15 दिनों के अंतराल पर लगभग चार बार छिड़काव कर सकते हैं. इससे कीटों की संख्या धीरे-धीरे कम हो जाती है और फसल सुरक्षित रहती है. नीम आधारित उत्पाद प्राकृतिक कीटनाशक होते हैं, इसलिए ये मिट्टी और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं पहुंचाते और पौधों की सेहत बनाए रखते हैं.

फसल को कीटों से बचाने के लिए खेत में येलो स्टिकी ट्रैप यानी पीले चिपचिपे जाल लगाना भी एक अच्छा तरीका है. किसान प्रति एकड़ लगभग 10 से 15 येलो स्टिकी ट्रैप लगा सकते हैं. इन पीले जालों की ओर कई कीट आकर्षित होकर चिपक जाते हैं और पौधों तक नहीं पहुंच पाते. इससे सफेद मक्खी और अन्य छोटे कीटों की संख्या कम हो जाती है. यह तरीका आसान, सस्ता और पर्यावरण के लिए सुरक्षित माना जाता है.
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