शिवहर जिले के पुरनहिया प्रखंड की रहने वाली 93 वर्षीय वृद्धा बबुनी देवी को कई साल पहले सरकारी दस्तावेजों में मृत घोषित कर दिया है और पेंशन बंद दी लेकिन वह अभी जीवित हैं और कई बार गुहार लगाने के बाद भी अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की. अब ये मामला गर्मा गया है.
बबुनी देवी एक सामान्य परिवार से आती हैं. उनका जन्म 1 जनवरी 1933 बताया जाता है और वे लाभार्थी संख्या 000003476236 के तहत वृद्धा पेंशन प्राप्त कर रही थीं. साल 2022 में जब उनके पोते सोमेश्वर कुमार बैंक पहुंचे और खाते की जानकारी ली, तो पता चला कि “मृत” दर्ज होने के कारण पेंशन बंद कर दी गई है. यह सुनकर परिवार हैरान रह गया. इसके बाद पंचायत सचिव से लेकर प्रखंड कार्यालय तक कई बार आवेदन दिए गए, लेकिन हर जगह केवल आश्वासन मिला, समाधान नहीं.
गुहार के बाद भी नहीं हुई कोई कार्रवाई
जांच में सामने आया कि पंचायत सचिव की कथित जांच रिपोर्ट में बबुनी देवी को मृत दर्शा दिया गया, जिसके आधार पर पेंशन बंद कर दी गई. विडंबना यह है कि बबुनी देवी का नाम आज भी मतदाता सूची में दर्ज है, वे नियमित रूप से गांव में रह रही हैं, लेकिन पेंशन की फाइल में उन्हें मृत बताया जा रहा है. उम्र के इस पड़ाव पर उनकी आंखों की रोशनी कमजोर हो गई है, कदम लड़खड़ाने लगे हैं और आवाज भी अब पहले जैसी नहीं निकलती, फिर भी वे अपने अधिकार के लिए संघर्ष कर रही हैं.
पोते सोमेश्वर कुमार का कहना है कि उन्होंने पंचायत सचिव, प्रखंड कर्मियों और अधिकारियों से कई बार गुहार लगाई, लेकिन तीन साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. इस दौरान पेंशन न मिलने से बुजुर्ग महिला के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया. परिवार को आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है.
जांच के बाद फिर शुरू होगी पेंशन
मामला सामने आने के बाद शिवहर की जिलाधिकारी प्रतिभा रानी ने स्वयं संज्ञान लिया है. डीएम ने संबंधित विभाग से रिपोर्ट तलब की है और जांच के आदेश दिए हैं. उन्होंने स्पष्ट कहा है कि यदि बबुनी देवी का दावा सही पाया जाता है तो तत्काल सरकारी अभिलेखों में सुधार कर उनकी वृद्धा पेंशन पुनः चालू कराई जाएगी. साथ ही, पिछले तीन वर्षों की रुकी हुई पेंशन राशि का भुगतान भी किया जाएगा. इसके अलावा, इस गंभीर लापरवाही के लिए जिम्मेदार कर्मियों पर कार्रवाई की बात भी कही गई है. यह मामला न सिर्फ प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करता है कि आखिर एक जिंदा इंसान को कागजों में ‘मृत’ कैसे कर दिया गया.
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