शिमला के ठियोग विधान सभा क्षेत्र की ग्राम पंचायत शटैआं में सेब के अलावा फूलगोभी, बंदगोभी, फ्रेंचबीन, शिमला मिर्च और मटर समेत विभिन्न प्रकार की सब्जियां उगाई जाती हैं. बारिश-बर्फबारी न होने से खेतों में बुआई नहीं हो पाई है, जमीन में सूखे के समय पड़ने वाली दरारें नजर आ रही हैं. इसी पंचायत के रहने वाले युवा विजेंद्र कंवर को कोरोना के चलते पर्यटन कारोबार को छोड़ना पड़ा था. कोविड में विजेंद्र को करोड़ों का नुकसान झेलना पड़ा, उसके बाद पुश्तैनी सेब के कार्य शुरू किया, लेकिन जिस तरह से मौसम कहर बरपा रहा है. उससे लागत भी नहीं निकल पा रही है. स्थिती इतनी खराब है कि आजीविका पर संकट साफ तौर पर दिखाई दे रहा है.
बीते तीन साल से सब्जी पर आपदा की मार
विजेंद्र कंवर ने कहा कि पिछले तीन सालों में लगातार हो रही आपदा से पहले सेब की पैदावार पर असर पड़ा, उसके बाद सब्जी मंडी में अच्छे दाम नहीं मिल पाए. विजेंद्र बताते हैं कि इस समय पिछले 3 महीनों में बारिश न होने से पूरे इलाके में सूखे जैसी स्थिती है. यहां का किसान-बागवान बारिश पर ही निर्भर है, सिंचाई का कोई साधन नहीं है, मौसम बिलकुल साथ नहीं दे रहा है. दिसंबर-जनवरी में बारिश और बर्फबारी न होने से न तो बागीचे में खाद डाल पा रहे हैं और न ही गोबर, न ही कोई कार्य हो पा रहा है. जमीन को खोदने के लिए कुदाल उठाएं तो ज्यादा नीचे तक कुदाल नहीं जाती है.
मौसम में आए अप्रत्याशित बदलाव के पीछ मानवीय कारण
विजेंद्र ने केंद्र और राज्य सरकार से मांग की कि हिमाचल प्रदेश के किसानों-बागवानों के हित्त में वर्तमान योजनाओं में बदलाव किया जाए. सिंचाई की व्यवस्था भी की जाए. साथ ही खेती-किसानी की लागत को कम करने के लिए खाद, स्प्रे समेत अन्य वस्तुओं के दामों में या तो कमी की जाए या फिर सब्सिडी को बढ़ाया जाए. इसी पंचायत के स्थानीय निवासी जगमोहन अत्री मौसम में आए इस अप्रत्याशित बदलाव के लिए मानवीय कारणों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं. जगमोहन का कहना है कि प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, जंगल काटे जा रहे हैं, जंगलों में आग लगाई जा रही है, अवैज्ञानिक तरीके से विकास कार्य किए जा रहे हैं, इस इलाके के समीप डैप बनने से भी लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. हिमाचल प्रदेश में भी ग्लोबल वॉर्मिंग का असर देखने को मिल रहा है. विश्वदेव अत्री का कहना है कि अभी स्थिती ये है कि किसान खेतों में बुआई तक नहीं कर पा रहे हैं. वर्तमान में मौसम में आए परिवर्तन से ग्रामीणों की आर्थिकी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. विश्व देव ने बताया कि इस पंचायत के बिलकुल साथ प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कुफरी भी है, यहां पर भी काफी लोगों को रोजगार मिलता था लेकिन बीते कुछ सालों से आ रही आपदाओं और सर्दी के मौसम में बर्फबारी न होने से पर्यटन कारोबार ठप हो गया है. उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि सरकार को हिमाचल प्रदेश की स्थिती को देखते हुए किसानों-बागवानों के लिए अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ेगा.
हिमाचल में कब से पड़ रहा सूखा
हिमाचल प्रदेश में बीते ढाई महीने पहले अक्तूबर महीने में बारिश हुई थी. इसके बाद हालांकि, अभी नए साल पर हल्की बरसात और बारिश जरूर हुई है, लेकिन वह नाममात्र थी. शिमला में इस बार बर्फबारी नहीं हुई है. मौसम विभाग के अनुसार, बीते 124 साल में दिसंबर महीने में छठी सबसे कम बारिश और बर्फबारी देखने को मिली. करीब 99 फीसदी कम बरसात दर्ज की गई. अहम बात है कि सूबे के ऊपरी इलाकों में सेब की फसल पर भी बर्फबारी ना होने का असर पड़ता है क्योंकि चिलिंग ऑवर्स पूरे नहीं होते हैं.
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