सीधी धूप और तेज हवा पौधों तक न पहुंचे
डॉ. असाटी के अनुसार, बरेजा एक प्रकार का शेड होता है जिसमें पान की खेती की जाती है. सामान्यतः 250 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में बरेजा तैयार किया जाता है. इसके चारों ओर साइड से नेट लगाया जाता है, ताकि सीधी धूप और तेज हवा पौधों तक न पहुंचे. ऊपर बांस की छत बनाई जाती है, जिससे छनकर धूप अंदर आए और पौधों को आवश्यक रोशनी मिलती रहे. बरेजा के अंदर पान के पौधे लाइन से लगाए जाते हैं, जिससे देखरेख और कटाई में आसानी होती है.
उन्होंने बताया कि बरेजा में देसी पान, बंगला पान, मीठा पान और कपूरी पान जैसी विभिन्न किस्में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती हैं. नमी और ठंडक बनाए रखने के लिए फॉगर और ड्रिप सिंचाई प्रणाली लगाई जाती है. साथ ही, बरेजा के चारों ओर केले के पौधे लगाने से अंदर ठंडी और नम हवा का प्राकृतिक प्रवाह बना रहता है, जो पान की फसल के लिए बेहद उपयोगी है.
बरेजा के ऊपर कुंदरू या परवल जैसी बेल वाली सब्जियां लगाई जा सकती हैं. इससे एक ओर छाया मिलती है, वहीं दूसरी ओर किसानों को अतिरिक्त आमदनी का स्रोत भी मिलता है. यह तकनीक छत्तीसगढ़ में सफलतापूर्वक अपनाई जा रही है और धीरे-धीरे किसानों में लोकप्रिय हो रही है.
तीखा पान पसंद करने वालों के लिए बंगला पान सर्वोत्तम
पान की किस्मों के उपयोग की बात करें तो तीखा पान पसंद करने वालों के लिए बंगला पान सर्वोत्तम माना जाता है. मीठा पान खाने वालों के लिए मीठा पान लगाया जा सकता है. देसी पान की मांग भी काफी अधिक है, क्योंकि यह मुंह में रखते ही घुल जाता है. वहीं कपूरी पान का उपयोग पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यों में किया जाता है, जिससे मंदिरों के आसपास इसका अच्छा बाजार बनता है. छत्तीसगढ़ में बिल्होरी मीठा पान का भी व्यापक उपयोग होता है.
डॉ. असाटी ने बताया कि फरवरी महीना पान की खेती शुरू करने का सबसे उपयुक्त समय है. लगभग 7 से 8 महीनों में पान की पहली तुड़ाई शुरू हो जाती है और एक पौधा करीब एक वर्ष तक पत्तियां देता रहता है. किसान एक बार पान की खेती करने के बाद कम से कम दो से तीन वर्षों तक लगातार उपज प्राप्त कर सकते हैं. एक पौधे से औसतन 150 से 200 पत्ते मिलते हैं.
एक लाख रुपये तक का मुनाफा
बाजार में पान की पत्ती की कीमत लगभग एक रुपये प्रति पत्ता तक मिल जाती है. यदि कोई किसान 250 वर्ग फीट क्षेत्र में पान की खेती करता है, तो उसे 90 हजार से एक लाख रुपये तक का मुनाफा हो सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यह खेती कम भूमि में अधिक आय देने वाली तकनीक है, जिसे अपनाकर छत्तीसगढ़ के किसान अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं.
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