भारत-अमेरिका के ट्रेड डील को लेकर पंजाब की राजनीति में बहस तेज हो गई है। यह मामला इसलिए खास है क्योंकि टकराव एक ही परिवार के दो बड़े राजनीतिक चेहरों, केंद्रीय रेल राज्य मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू और उनके चचेरे भाई पूर्व कांग्रेसी मंत्री गुरकीरत सिंह कोटली के बीच है। दोनों इस मुद्दे पर बिल्कुल विपरीत रुख अपनाए हुए हैं। तीन दिन पहले लुधियाना के दोराहा दौरे के दौरान रवनीत सिंह बिट्टू ने पूरे आत्मविश्वास के साथ कहा था कि मार्च में फाइनल होने जा रही यह ट्रेड डील भारत की अर्थव्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित होगी। उन्होंने दावा किया कि पंजाब की फसलों को, जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बिकती हैं, किसी भी तरह का नुकसान नहीं होगा। बिट्टू ने स्पष्ट शब्दों में कहा, “एक भी दाना एमएसपी से बाहर नहीं जाएगा।” उनके अनुसार, भाजपा सरकार के कार्यकाल में एमएसपी पर रिकॉर्ड खरीद हुई है, जिससे किसानों को पहले से कहीं अधिक मजबूती मिली है। बिट्टू ने की मोदी और अमित शाह की तारीफ बिट्टू ने डेयरी सेक्टर का उदाहरण देते हुए कहा कि पंजाब दूध उत्पादन में अग्रणी है और गुजरात मॉडल के साथ मिलकर देश को और मजबूत किया जा सकता है। उनका संकेत था कि अगर देश आर्थिक रूप से मजबूत होगा, तो पंजाब के किसान और उत्पादक वर्ग को भी बड़े अवसर मिलेंगे। इसके साथ ही बिट्टू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की तारीफ करते हुए गुजरात मॉडल और अमूल की सफलता का जिक्र किया। उन्होंने कहा, “जिस नेता को देश की जनता ने तीसरी बार प्रधानमंत्री चुना है, क्या वह देश और किसानों की चिंता नहीं करेगा?” पूर्व मंत्री गुरकीरत सिंह कोटली ने सवाल खड़े किए दूसरी ओर, आज खन्ना में कांग्रेस के रोष प्रदर्शन के दौरान बिट्टू के चचेरे भाई और पूर्व मंत्री गुरकीरत सिंह कोटली ने इस ट्रेड डील पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। कोटली से जब उनके भाई बिट्टू के दावे पर पूछा गया तो उन्होंने कहा कि भाजपा के नेता बड़े-बड़े दावे तो कर रहे हैं, लेकिन यह साफ नहीं कर रहे कि जमीनी स्तर पर किसानों को असली फायदा कैसे मिलेगा। उन्होंने कहा, “तरक्की की बात करना आसान है, लेकिन यह भी बताना जरूरी है कि किसान की आमदनी कैसे बढ़ेगी।” पंजाब को करना पड़ेगा प्रतिस्पर्धा का सामना : कोटली कोटली ने कहा कि अगर विदेशी कृषि उत्पाद बड़े पैमाने पर भारतीय बाजार में आए, तो पंजाब के किसानों को कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने भाजपा पर आरोप लगाया कि पार्टी राजनीतिक लाभ के लिए बड़े वादे कर रही है, जबकि जमीनी हकीकत कुछ और हो सकती है। इस तरह, एक ही परिवार के दो प्रमुख राजनीतिक चेहरों के अलग-अलग विचारों ने इस ट्रेड डील को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बना दिया है।
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