मधुबनी के सांसद डॉ. अशोक कुमार यादव ने कहा है कि हर गरीब को रोजगार मिले और उसकी गरिमा का सम्मान हो, इसी उद्देश्य से केंद्र सरकार ‘जी राम जी बिल’ लेकर आई है। वे सोमवार को मधुबनी परिसदन में प्रेस को संबोधित कर रहे थे।
इस दौरान उन्होंने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि जैसे ही किसी योजना के नाम के साथ राम का नाम जुड़ता है, कुछ लोगों को अनावश्यक परेशानी होने लगती है, जबकि महात्मा गांधी स्वयं रामराज्य की कल्पना करते थे।
“राम नाम से क्यों होती है परेशानी”
डॉ. अशोक कुमार यादव ने कहा कि राम भारतीय संस्कृति और मूल्यों का प्रतीक हैं। राम का नाम जुड़ते ही कुछ लोगों को असहजता क्यों महसूस होती है, यह समझ से परे है। उन्होंने कहा, “महात्मा गांधी ने अपने पूरे जीवन में रामराज्य की बात की। आज अगर गरीबों के कल्याण से जुड़ी किसी योजना में राम का नाम आता है, तो उस पर आपत्ति जताना दुर्भाग्यपूर्ण है।”
नई योजना में बढ़ेंगे काम के दिन
सांसद ने बताया कि ‘जी राम जी बिल’ के तहत ग्रामीण मजदूरों को पहले की तुलना में अधिक रोजगार के अवसर मिलेंगे। नई योजना में हर साल 125 दिन का वेतनयुक्त रोजगार देने की गारंटी दी गई है। इसके साथ ही मजदूरों को उनका पारिश्रमिक भी पहले की अपेक्षा जल्दी मिलेगा, जिससे उनकी आर्थिक परेशानियां कम होंगी।
आदिवासी क्षेत्रों को मिलेगा अतिरिक्त लाभ
डॉ. यादव ने बताया कि वन क्षेत्रों में काम करने वाले अनुसूचित जनजाति के श्रमिकों के लिए इस योजना में विशेष प्रावधान किया गया है। ऐसे श्रमिकों को 25 दिन का अतिरिक्त रोजगार मिलेगा। इससे आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आजीविका के अवसर बढ़ेंगे और पलायन पर भी रोक लगेगी।
कृषि और मजदूरी के बीच बनेगा संतुलन
उन्होंने कहा कि यह योजना कृषि और मजदूरी के बीच संतुलन स्थापित करने में अहम भूमिका निभाएगी। किसान परिवारों को खेती के मौसम के बाहर भी रोजगार मिलेगा, जिससे उनकी आय में स्थिरता आएगी। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी और गांवों में ही रोजगार के अवसर सृजित होंगे।
मनरेगा का इतिहास गिनाया
प्रेस वार्ता के दौरान सांसद ने मनरेगा के इतिहास पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनरेगा की शुरुआत वर्ष 2006 में हुई थी। सरकारी आंकड़ों के अनुसार अब तक इस योजना पर कुल 11.74 लाख करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। इनमें से 8.53 लाख करोड़ रुपये वर्तमान सरकार के कार्यकाल में खर्च हुए हैं।
“यह कोई कोरी गारंटी नहीं”
डॉ. अशोक कुमार यादव ने कहा कि ‘जी राम जी बिल’ में 125 दिन के रोजगार की जो गारंटी दी जा रही है, वह केवल कागजी नहीं है। इसके लिए 1.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि का प्रावधान किया गया है। उन्होंने कहा कि सरकार ने बजट के माध्यम से यह स्पष्ट कर दिया है कि वह गरीबों के रोजगार को लेकर गंभीर है।
रोजगार योजनाओं के नाम बदलने का इतिहास
सांसद ने विपक्ष के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि रोजगार योजनाओं के नाम बदलना कोई नई बात नहीं है। उन्होंने बताया कि 1980 में इंदिरा गांधी ने सभी पुरानी रोजगार योजनाओं को मिलाकर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम शुरू किया था। इसके बाद राजीव गांधी सरकार ने इसका नाम बदलकर जवाहर रोजगार योजना कर दिया।
“नाम बदलना अपमान नहीं होता”
डॉ. यादव ने कहा कि सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह सरकार ने वर्ष 2004 में इस योजना को NREGA नाम दिया, जिसे 2005 में MNREGA कर दिया गया। उन्होंने सवाल उठाया कि जब कांग्रेस सरकार ने जवाहर रोजगार योजना का नाम बदला था, तो क्या वह पंडित जवाहरलाल नेहरू का अपमान था?
अन्य योजनाओं के नाम बदलने का उदाहरण
उन्होंने कहा कि पहले आवास योजना का नाम ग्रामीण आवास योजना था, जिसे राजीव गांधी ने 1985 में इंदिरा आवास योजना कर दिया। इसी तरह अप्रैल 2005 में ग्रामीण विद्युतीकरण योजना को राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना नाम दिया गया, जिसे 25 जुलाई 2015 को दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना कर दिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि हर योजना में गांधी-नेहरू परिवार का नाम जबरन जोड़ा गया।
“मोदी सरकार में नाम नहीं, काम बोलता है”
डॉ. अशोक कुमार यादव ने कहा कि मोदी सरकार में नाम से ज्यादा काम को प्राथमिकता दी जाती है। सरकार का फोकस योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और गरीबों तक लाभ पहुंचाने पर है, न कि सिर्फ नामकरण पर।
बदला हुआ ग्रामीण भारत
सांसद ने कहा कि वर्ष 2005 में जब मनरेगा शुरू हुई थी, उस समय ग्रामीण बेरोजगारी एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन 2005 के बाद ग्रामीण भारत में काफी बदलाव आया है। अब जरूरत है कि रोजगार योजनाओं को समय के अनुरूप और अधिक प्रभावी बनाया जाए।
उन्होंने कहा कि ‘जी राम जी बिल’ इसी दिशा में एक बड़ा कदम है, जो गरीबों को रोजगार के साथ-साथ सम्मान भी दिलाएगा।

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