हैदराबाद के चौमहल्ला पैलेस में सुरक्षित यह 6 किलो वजनी चांदी की मोहर सिर्फ एक प्रशासनिक उपकरण नहीं, बल्कि निजामों की सत्ता, वैभव और शाही संस्कृति का जीवंत प्रतीक है. फारसी नक्काशी और कैलीग्राफी में ढली यह मोहर उस दौर के राजसी दस्तावेजों की कानूनी मान्यता का अंतिम प्रमाण थी.
चौमहल्ला पैलेस के संग्रहालय में रखी यह मोहर शुद्ध चांदी से निर्मित है. इसका आकार इतना बड़ा है कि इसे उठाने के लिए विशेष प्रयास की आवश्यकता होती है. इस पर फारसी लिपि में अत्यंत बारीक नक्काशी की गई है और मोहर के मध्य में निजाम का नाम अंकित है. कला के नजरिए से देखें तो यह कैलीग्राफी का अद्भुत नमूना है, जो उस समय की फारसी संस्कृति और दक्कनी प्रभाव के मेल को दर्शाता है.
सत्ता का सर्वोच्च प्रतीक
इतिहासकार ज़ाहिद सरकार बताते हैं कि निजामों के शासनकाल में यह मोहर अंतिम मुहर मानी जाती थी. जब भी कोई नया कानून, भूमि अनुदान या रियासत का कोई बड़ा समझौता होता था, तो उसे फरमान कहा जाता था. बिना इस विशाल मोहर की छाप के, कोई भी दस्तावेज कानूनी रूप से मान्य नहीं होता था. यह मोहर निजाम की उपस्थिति और उनकी शक्ति का आभास कराती थी, चाहे वे व्यक्तिगत रूप से वहां उपस्थित हों या नहीं.
यह मोहर आसफ जाही राजवंश के वैभव को दर्शाती है, हैदराबाद के निजाम कभी दुनिया के सबसे अमीर व्यक्तियों में शुमार थे. उनके पास जैकब डायमंड जैसे बेशकीमती रत्न थे, लेकिन यह चांदी की मोहर उनकी प्रशासनिक मजबूती का प्रतीक थी. आज भी जब पर्यटक चौमहल्ला पैलेस जाते हैं, तो यह मोहर उनके आकर्षण का केंद्र होती है क्योंकि इसे दुनिया की सबसे बड़ी शाही मोहरों में से एक माना जाता है.
ऐतिहासिक महत्व
इतिहासकारों के अनुसार, इस तरह की विशाल मोहरों का उपयोग इसलिए किया जाता था ताकि राजसी दस्तावेजों के साथ कोई छेड़छाड़ न की जा सके और उन्हें भव्यता प्रदान की जा सके. यह मोहर न केवल हैदराबाद के इतिहास को समेटे हुए है, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद राजशाही की भव्य जीवनशैली का भी एक झरोखा है.
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