फुटपाथ पर खुली हवा अपनी आज़ादी
Local18 की टीम रात करीब 10 बजे रिपोर्टिंग के लिए निकली. शहर के कई इलाकों में रैन बसेरे खुले थे वहाँ रोशनी थी सोने के इंतज़ाम भी थे. फिर भी कई लोग सड़क किनारे, फुटपाथ पर मंदिरों के बाहर दुकानों के शटरों के पास लेटे मिले. टीम ने उनसे पूछा जब रैन बसेरे हैं, तो यहां क्यों सोते हो? ज़्यादातर ने कैमरे पर कुछ बोलने से बचा लिया. कुछ ने साफ़ कह दिया पसंद नहीं है वहाँ रहना. बाकी ने धीरे से बताया वहाँ की भीड़, माहौल, नियम इन सबके बीच खुद को बेगाना महसूस करते हैं. फुटपाथ पर खुली हवा अपनी आज़ादी यही उन्हें ज़्यादा अपना लगता है.
बाटा चौक के पास हनुमान मंदिर के सामने का नज़ारा तो दिल छू लेने वाला था. यहाँ कई परिवार छोटे बच्चों के साथ ठंडी ज़मीन पर लेटे हुए थे. एक महिला चूल्हे पर खाना बना रही थी, बच्चे सर्द हवा में सिकुड़कर बैठे थे. रात गहराती जा रही थी तापमान गिरता जा रहा था, मगर इनके लिए ये सब रोज़ का है. ऐसा लगता है जैसे ठंड भी इनके हौसले के आगे हार मान गई हो.
रैन बसेरे में रहना पसंद नहीं
रात बढ़ती गई ठंड और तेज़ हो गई, मगर फुटपाथ पर लेटे इन परिवारों के चेहरे पर कोई शिकायत नहीं थी. बच्चे ठंड से सिहर रहे थे, लेकिन माँ की गोद में सुकून ढूंढ़ रहे थे. औरतें-मर्द पतले कंबलों में लिपटे नींद की कोशिश कर रहे थे. दूर कहीं गाड़ियों का शोर, बीच-बीच में तेज़ चलती हवाएँ और सड़क की सख्त ज़मीन ये सब मिलकर एक ऐसी हकीकत दिखा रहे थे जिसे हम अकसर अनदेखा कर देते हैं.
फुटपाथ ही इनका सबकुछ
फ़रीदाबाद जैसे बड़े शहर में रैन बसेरे तो बने हैं इंतज़ाम भी होते हैं टीमें जागरूकता फैलाती हैं. लेकिन इन ज़िंदगियों के अपने डर हैं अपनी आदतें हैं अपनी मजबूरियाँ हैं. इनके लिए घर का मतलब कुछ और है. फुटपाथ ही इनकी सुरक्षा है यही इनका घर है और यही इनकी पूरी दुनिया.
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