Agriculture Tips : सर्दी के मौसम में संतरे की खेती किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन जाती है. तापमान में गिरावट, कोहरा और बढ़ी नमी के कारण माइट्स, गमोसिस और सिट्रस कैंकर जैसे रोग तेजी से फैलते हैं. अगर समय रहते सही देखभाल और उपचार न किया जाए तो फसल की गुणवत्ता और उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है.
Agriculture Tips: सर्दी के मौसम में संतरे की खेती को अधिक देखभाल की जरूरत होती है. इस समय तापमान में गिरावट, कोहरा और नमी बढ़ने से कई प्रकार के रोग व कीट सक्रिय हो जाते हैं, जिससे फल उत्पादन और गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ता है. इस समय छोटे पौधों की सही देखभाल नहीं होने पर माइट्स, गमोसिस, पत्ती झुलसा और सिट्रस कैंकर जैसे रोग तेजी से फैलते हैं.

एग्रीकल्चर एक्सपर्ट दिनेश जाखड़ ने बताया कि सर्दी के मौसम में संतरे में माइट्स की समस्या प्रमुख रहती है. फल की तुड़ाई के बाद पेड़ों से सूखी, कमजोर और रोगग्रस्त टहनियों को काटकर नष्ट कर देना चाहिए. इसके बाद कार्बन्डाजिम 50 प्रतिशत डब्ल्यू.पी. एक ग्राम प्रति लीटर पानी में घोलकर पेड़ों पर छिड़काव करना फायदेमंद रहता है. इससे फफूंद जनित रोगों का खतरा कम होता है और पौधे स्वस्थ बने रहते हैं.

माइट्स के प्रभावी नियंत्रण के लिए रासायनिक उपचार भी आवश्यक हो जाता है. इसके लिए किसान डायकोफॉल 2 मिली प्रति लीटर पानी अथवा इथियान 2 मिली प्रति लीटर पानी या फिर गंधक द्रव 3 ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव कर सकते हैं. आवश्यकता अनुसार 15 दिन के अंतराल पर दूसरा छिड़काव करना चाहिए, जिससे माइट्स का प्रकोप पूरी तरह नियंत्रित हो सके और नई कोपलों को नुकसान न पहुंचे.
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एग्रीकल्चर एक्सपर्ट के अनुसार, सर्दियों में संतरे के बागानों में गमोसिस रोग भी देखने को मिलता है, जिसमें तने से गोंद जैसा पदार्थ निकलने लगता है. यह रोग अधिक नमी और खराब जल निकास के कारण होता है. इसके उपचार के लिए खेत में पानी का उचित निकास रखें और रोगग्रस्त भाग को खुरचकर बोर्डो पेस्ट या कॉपर ऑक्सीक्लोराइड का लेप करें. इसके अलावा समय रहते उपचार करने से पेड़ को मरने से बचाया जा सकता है.

प्राकृतिक और जैविक तरीकों से भी संतरे के रोगों और कीटों पर नियंत्रण संभव है. इसके लिए किसान का नीम तेल 3 से 5 मिली प्रति लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करने से माइट्स और रस चूसने वाले कीटों की संख्या कम होती है. साथ ही छाछ या गौमूत्र का घोल बनाकर छिड़काव करने से फफूंद जनित रोगों की रोकथाम में मदद मिलती है और पौधों की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है.

इसके अलावा अदरक, लहसुन और हरी मिर्च का अर्क बनाकर छिड़काव करना भी एक प्रभावी घरेलू नुस्खा है. यह अर्क कीटों को दूर रखने के साथ-साथ पर्यावरण के लिए सुरक्षित रहता है. खेत में जैविक खाद, वर्मी कम्पोस्ट और ट्राइकोडर्मा का उपयोग करने से मिट्टी की सेहत सुधरती है और रोग पैदा करने वाले जीवाणुओं पर प्राकृतिक नियंत्रण बना रहता है.
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