What is Naula in Mountains : पहाड़ों पर ये कभी प्यास बुझाने का सबसे आसान साधन थे. पत्थरों से बने ये संरक्षित जलस्रोत आज भी उत्तराखंड की पहचान हैं. कई तो 400 से 500 वर्ष पुराने हैं. इनकी स्थापत्य कला भी अपने आप में खास है. इनके भीतर पत्थरों की मजबूत दीवारें, ऊपर छत, नीचे तक जाने के लिए छोटी-छोटी सीढ़ियां और मंदिरनुमा प्रवेश द्वार मिल जाएंगे. कई नौलों की दीवारों पर देवी-देवताओं की सुंदर नक्काशी भी देखने को मिलती है. ये हमें याद दिलाते हैं कि पुराने समय में लोग प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर कैसा जीवन जीते थे.
नौले केवल पानी भरने का स्थान नहीं थे, ये गांव के सामाजिक और धार्मिक जीवन का केंद्र भी हुआ करते थे. सुबह-शाम महिलाएं यहां पानी भरने आती थीं, जहां आपसी बातचीत, सुख-दु:ख साझा करना आम दिनचर्या होती थी. कई गांवों में विवाह के बाद नई बहू की ओर से नौले में पूजा करना शुभ माना जाता था, जिसे जल और जीवन के सम्मान का प्रतीक समझा जाता था. नौलों के भीतर पत्थरों की मजबूत दीवारें, ऊपर छत, नीचे तक जाने के लिए छोटी-छोटी सीढ़ियां और मंदिरनुमा प्रवेश द्वार बनाए जाते. कई नौलों की दीवारों पर देवी-देवताओं की सुंदर नक्काशी भी होती है. कुमाऊं क्षेत्र में एक हथिया नौला और अल्मोड़ा जिले का स्यूनराकोट नौला आज भी प्राचीन जल स्थापत्य का बेहतरीन उदाहरण माने जाते हैं.
इस बात के गवाह
ग्रामीण समुदाय नौलों को अपनी सामूहिक जिम्मेदारी समझता था. हर महीने या तय समय पर गांव के लोग मिलकर इनकी सफाई करते थे, ताकि पानी हमेशा स्वच्छ बना रहे. यह किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे गांव का दायित्व होता था. आज भले ही आधुनिक जल योजनाएं आ गई हो, लेकिन कई पहाड़ी गांवों में नौले अब भी ठंडे और शुद्ध पानी के लिए जाने जाते हैं. ये हमें याद दिलाते हैं कि पुराने समय में लोग प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर कैसे जीवन जीते थे. नौले केवल पत्थर की संरचना नहीं, बल्कि जल संरक्षण, आस्था और सामाजिक एकता का जीता-जागता प्रतीक है.
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Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें
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