पलाश और होली का पुराना रिश्ता
हमारी परंपरा में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ने का उत्सव भी है. वसंत ऋतु में जब पलाश के पेड़ केसरिया फूलों से भर जाते हैं, तब यही फूल होली के रंग बनते थे.
पहले के समय में लोग इन्हें उबालकर या पीसकर रंग तैयार करते थे. यह रंग न सिर्फ त्वचा के लिए सुरक्षित होता था, बल्कि हल्की प्राकृतिक खुशबू भी देता था. पलाश का रंग केसरिया होता है, जो देखने में बेहद आकर्षक लगता है और शरीर को ठंडक भी देता है.
बाजार के रंग क्यों हैं खतरनाक?
आजकल बाजार में मिलने वाले कई गुलाल और रंग रासायनिक पदार्थों से बने होते हैं. इनमें पारा (Mercury), लेड (Lead) और कई तरह के सिंथेटिक डाई मिलाए जाते हैं. इनसे त्वचा पर खुजली, एलर्जी, जलन और यहां तक कि आंखों में संक्रमण की समस्या हो सकती है. लंबे समय तक ऐसे रंगों का इस्तेमाल त्वचा को गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकता है.
घर पर ऐसे बनाएं टेसू का रंग
केसरिया गीला रंग बनाने की विधि:
करीब 200 ग्राम ताजे या सूखे टेसू के फूल लें. इन्हें साफ कर लें. 2 लीटर पानी में 10 से 15 मिनट तक उबालें. पानी का रंग गहरा केसरिया हो जाएगा. ठंडा होने के बाद यह प्राकृतिक रंग होली खेलने के लिए तैयार है.
हर्बल गुलाल बनाने का तरीका:
सूखे फूलों को अच्छी तरह पीसकर बारीक पाउडर बना लें. इसे मलमल के कपड़े या छलनी से छान लें, ताकि मोटे रेशे अलग हो जाएं. जो महीन पाउडर बचेगा, वही असली हर्बल गुलाल है.
पलाश गुलाल के फायदे
त्वचा पर जलन या एलर्जी नहीं होती
प्राकृतिक खुशबू से माहौल ताज़गी भरा रहता है
आयुर्वेद के अनुसार त्वचा के लिए लाभकारी
वातावरण को प्रदूषित नहीं करता
डॉ. शर्मा बताते हैं कि पलाश में औषधीय गुण भी होते हैं. यह त्वचा को निखारने और रक्त शुद्धि में सहायक माना जाता है.
इस होली अपनाएं देसी रंग
होली का असली मजा तब है जब रंगों के साथ सेहत भी सुरक्षित रहे. इस बार केमिकल रंगों को अलविदा कहिए और टेसू के फूलों से बना प्राकृतिक गुलाल अपनाइए. इससे त्योहार की खुशी भी दोगुनी होगी और प्रकृति के साथ जुड़ाव भी बना रहेगा.
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