जैसलमेर जिले के मूलसागर गांव से निकलकर तगाराम भील आज देश के चुनिंदा लोक कलाकारों में शामिल हो चुके हैं, जिन्होंने बिना किसी दिखावे और मंचीय चकाचौंध के, केवल साधना और समर्पण के बल पर भारतीय लोक संगीत को वैश्विक पहचान दिलाई है। 62 वर्षीय तगाराम भील का जीवन संघर्षों से भरा रहा है। आर्थिक तंगी के चलते उनके पिता उन्हें बकरियां चराने भेजते थे, जबकि वे स्वयं ऊंट पर लकड़ियां बेचकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। इन्हीं कठिन परिस्थितियों के बीच उनका झुकाव पारंपरिक लोक वाद्य अलगोजा की ओर हुआ।
जंगलों और सुनसान स्थानों पर करते थे अभ्यास
महज सात वर्ष की उम्र में अलगोजा के प्रति लगाव पैदा हुआ, लेकिन पिता की सख्ती के कारण वे चोरी-छुपे जंगलों और सुनसान स्थानों पर अभ्यास करते थे। जब पिता घर पर नहीं होते, तब वे चुपचाप अलगोजा निकालकर रियाज करते। निरंतर अभ्यास का ही परिणाम रहा कि 11 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहला अलगोजा खरीदा और विधिवत संगीत यात्रा शुरू की।
1981 से शुरू हुआ सफर
वर्ष 1981 तगाराम भील के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। जैसलमेर में आयोजित मरु महोत्सव और स्वतंत्रता दिवस समारोह में पहली बार उन्हें मंच पर प्रस्तुति का अवसर मिला। यहीं से उनके सुरों ने लोगों का ध्यान खींचा और पहचान बनने लगी। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। स्थानीय कार्यक्रमों से शुरू हुआ सफर राष्ट्रीय मंचों तक पहुंचा और वर्ष 1996 में फ्रांस में प्रस्तुति के साथ उनका संगीत अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने लगा।
35 से अधिक देशों में बिखेरी थार की खुशबू
तगाराम भील अब तक अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस, अफ्रीका सहित 35 से अधिक देशों में भारतीय लोक संगीत और राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत का परचम लहरा चुके हैं। उनके सुरों ने विदेशी मंचों पर थार की पहचान बनाई और नई पीढ़ी को इस पारंपरिक वाद्य की ओर आकर्षित किया। अंतरराष्ट्रीय ख्याति के बावजूद उनकी जीवनशैली आज भी अत्यंत सादगीपूर्ण है। उल्लेखनीय है कि इतनी बड़ी पहचान के बाद भी वे आजीविका के लिए खनन कार्य से जुड़े हुए हैं।
सिर्फ वादक नहीं, अलगोजा के शिल्पकार भी
तगाराम भील केवल कुशल कलाकार ही नहीं, बल्कि दक्ष शिल्पकार भी हैं। वे अपने हाथों से बांस से बने अलगोजा तैयार करते हैं, जो देश ही नहीं विदेशों तक भेजे जाते हैं। उनका मानना है कि अलगोजा केवल वाद्य नहीं, बल्कि साधना है, जिसमें सांस, मन और आत्मा का संतुलन आवश्यक है।
लोक कला की जीत
पद्मश्री सम्मान की यह घोषणा केवल तगाराम भील की व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उन दुर्लभ लोक कलाओं की जीत है, जो आज भी अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। इससे पहले जैसलमेर जिले के हमीरा गांव के कमायचा वादक साकर खान और बईया गांव के लोक कलाकार अनवर खान को भी पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है।
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क्या है अलगोजा?
अलगोजा एक सुशीर (वायु) वाद्य यंत्र है, जिसमें बांस से बनी दो जुड़ी हुई बांसुरियां होती हैं। एक बांसुरी से मुख्य धुन निकलती है, जबकि दूसरी से निरंतर स्वर (ड्रोन) निकलता है। वादक एक साथ दोनों बांसुरियों में हवा फूंकता है। यह वाद्य राजस्थान, पंजाब, सिंध और गुजरात के लोक संगीत में विशेष स्थान रखता है।
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