संभाग के सबसे बड़े पीबीएम हॉस्पिटल में मेडिसिन की खरीद के दस करोड़ रुपए के टेंडर के लिए जारी की गई नई बिड में दवा निर्माता कंपनियों के ब्लैकलिस्टेड होने का शपथ पत्र हटा दिया गया है। इससे डिबार हो चुकी 9 दवा निर्माता कंपनियों की एंट्री गुपचुप तरीके से कराने का मामला सामने आया है। माना जा रहा है कि चहेती फर्मों को काम देने के लिए यह फॉर्मूला अपनाया गया है। मामला संभागीय आयुक्त तक पहुंचा तो जांच कमेटी भी उन्हीं चिकित्साधिकारियों की बना दी, जिन्होंने तकनीकी बिड फाइनल की थी। पीबीएम में मरीजों के लिए दवाओं की खरीद के इस बार पांच-पांच करोड़ के रेट कॉन्ट्रैक्ट किए जा रहे हैं। अब तक कैंसर के पांच और जनरल मेडिसिन के छह फर्मों से पांच-पांच करोड़ के दो रेट कॉन्ट्रैक्ट प्रोडक्ट वाइज किए गए हैं। सभी फर्म स्थानीय हैं। इनमें तीन फर्म ऐसी हैं, जिन्होंने दोनों तरह की मेडिसिन में रेट कॉन्ट्रैक्ट किया है, जबकि बाकी सभी नई हैं। खास बात ये है कि इनमें से 5 फर्मों ने 9 ऐसी दवा निर्माता कंपनियों के ऑथराइजेशन दिए हैं, जिनमें से कुछ की डिबार अवधि पिछले साल खत्म हो गई तो कुछ की इस साल मार्च में खत्म होगी। भास्कर ने ई-प्रोक्योरमेंट साइट पर टेंडर डॉक्यूमेंट खंगाले तो यह मामला सामने आया। संभागीय आयुक्त तक प्रकरण पहुंचने के बाद हॉस्पिटल में खलबली मची है। जल्दबाजी में जांच भी उन्हीं को सौंप दी गई, जिन्होंने तकनीकी बिड पर मुहर लगाई थी। कमेटी में क्रय समिति के स्थायी सदस्य डॉ. शिवशंकर झंवर और डॉ. मनोज माली, विशेषज्ञ सदस्य डॉ. रितिक अग्रवाल, डॉ. विनोद मेघवाल और वरिष्ठ लेखाधिकारी शामिल हैं। डॉक्यूमेंट पर अधीक्षक के भी साइन हैं। प्रोडक्ट विशेष के लिए किस कंपनी को कब किया डिबार इंटास फार्मास्यूटिकल्स, हेल्थ बायोटेक और एडमेक लाइफ साइंसेज को 2024 में एक-एक साल के लिए। यूनाइटेड बायोटेक को 2022 में तीन साल के लिए। इसके साथ ही जायडस, ओत्सुका, क्वेस्ट, समर्थ और जैक्सन के भी ऑथराइजेशन दिए गए हैं। जायडस को तो पीबीएम हॉस्पिटल से डिबार किया गया था। जैक्सन लैबोरेट्रीज की एक करोड़ की धरोहर राशि पिछले करीब डेढ़ साल से जब्त पड़ी है। यह है जांच के बिंदु इधर, एनेस्थीसिया का टेंडर ही गलत कर दिया एनेस्थीसिया की दवाओं की खरीद के लिए पांच करोड़ का टेंडर किया गया है। इस टेंडर में कुल 104 तरह की दवाएं रखी गई हैं, जिनमें 6 नारकोटिक्स ड्रग्स हैं। इस टेंडर में दो फर्म आई हैं, जिनके पास नारकोटिक्स का सर्टिफिकेट ही नहीं है। नारकोटिक्स ड्रग्स की सरकारी सप्लाई है। आरएमएससीएल से उनकी निशुल्क सप्लाई होती है। केवल शब्दों के हेरफेर ने बदला टेंडर मेडिसिन के टेंडरों में तकनीकी तुलनात्मक विवरण में 10 नंबर बिंदु में लिखा है कि पिछले तीन साल से ब्लैकलिस्ट/डिबार्ड ‘फर्म’ की निविदा पर विचार नहीं किया जाएगा। इसके लिए लेटरहेड पर शपथ पत्र देना होगा, जबकि आरटीपीपी नियम के तहत डीलर को ऑथराइजेशन देने वाली दवा निर्माता कंपनी/ इंपोर्टर / मार्केटिंग कंपनी को इस बात का शपथ देना होता है कि वह केंद्र और राज्य के संस्थानों में डिबार नहीं है। ना ही तीन साल में उत्पादों को रिकॉल किया गया है। टेंडरों में पिछले कई सालों से यही शपथ पत्र मांगा जाता रहा है। इस बार बड़ी चतुराई से शर्त में केवल फर्म का हवाला देने से पूरा टेंडर ही बदल दिया है। माना जा रहा है कि इसके पीछे कुछ खास फर्मों को लाभ पहुंचाने की मंशा है। “संभागीय आयुक्त के निर्देश पर दोनों टेंडरों की जांच कराई जा रही है। तकनीकी बिड फाइनल करने वाली कमेटी की रिपोर्ट आने के बाद दोबारा जांच करवा ली जाएगी। यह टेंडर मेरे ज्वाइन करने से पहले के हैं। गलत टेंडर नहीं होने देंगे।” -डॉ. बीसी घीया, अधीक्षक, पीबीएम हॉस्पिटल
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