एक ओर बिहार सरकार शिक्षा व्यवस्था को स्मार्ट क्लास, डिजिटल बोर्ड और कंप्यूटर शिक्षा से जोड़ने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं गया शहर के बक्शु बीघा स्थित एक प्राथमिक मध्य विद्यालय की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। वर्ष 1998 से संचालित यह विद्यालय आज तक अपने स्थायी भवन से वंचित है और मजबूरी में एक मंदिर परिसर में चल रहा है।
विद्यालय के पास न तो पक्की इमारत है और न ही बच्चों के बैठने के लिए बेंच-डेस्क की व्यवस्था। छोटे-छोटे बच्चे खुले आसमान के नीचे जमीन पर बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। मंदिर परिसर ही इन नौनिहालों का विद्यालय बन गया है, जहां पढ़ाई के साथ-साथ मौसम की मार भी झेलनी पड़ती है।
बरसात में मंदिर के अंदर लगती हैं कक्षाएं
बरसात के दिनों में स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। खुले में पढ़ाई संभव नहीं होने पर बच्चों को मंदिर के अंदर बैठाकर कक्षाएं संचालित की जाती हैं। वहीं गर्मी के मौसम में मंदिर परिसर में लगे पेड़ों की छांव में बच्चों को पढ़ाया जाता है। ऐसे माहौल में न तो शोर से बचाव है और न ही पढ़ाई के लिए अनुकूल वातावरण, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है।
शिक्षा विभाग की उदासीनता
विद्यालय के प्रधानाध्यापक मुकेश कुमार सिंह ने बताया कि वे हाल ही में इस विद्यालय में पदस्थापित हुए हैं। इससे पहले भी वर्ष 1998 से अब तक जितने भी प्रधानाध्यापक रहे, सभी ने विद्यालय भवन निर्माण को लेकर शिक्षा विभाग से पत्राचार किया, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं की गई।
शौचालय तक नहीं, सड़क पार करने को मजबूर बच्चे
प्रधानाध्यापक ने यह भी बताया कि विद्यालय में शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है। बच्चों को शौच के लिए सड़क पार करनी पड़ती है, जिससे हर समय दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। यह स्थिति विशेष रूप से छोटे बच्चों और छात्राओं के लिए बेहद चिंताजनक है।
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स्थानीय लोगों में रोष
स्थानीय लोगों का कहना है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर इस तरह की लापरवाही बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है। एक ओर सरकार शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता बताती है, तो दूसरी ओर जमीनी स्तर पर हालात इसके ठीक उलट हैं। स्मार्ट क्लास और डिजिटल शिक्षा की बातें केवल कागजों और भाषणों तक ही सीमित होकर रह गई हैं।
मंदिर में पढ़ाई कर रहे इन बच्चों की स्थिति यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या यही वह शिक्षा व्यवस्था है, जिसका सपना दिखाया जा रहा है। बिना भवन, बिना बुनियादी सुविधाओं और असुरक्षित माहौल में पढ़ाई कर रहे बच्चों का भविष्य भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है।
अब जरूरत है कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग इस मामले को गंभीरता से लें और प्राथमिकता के आधार पर विद्यालय भवन, शौचालय और अन्य बुनियादी संसाधनों की व्यवस्था सुनिश्चित करें, ताकि शिक्षा वास्तव में नारों और फाइलों से निकलकर कक्षाओं तक पहुंच सके।
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