Traditional fuel Goitha: गांवों में होली से पहले मवेशियों के गोबर से गोईठा बनाया जाता है, जो धार्मिक आस्था, पारंपरिक ईंधन और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है. होलिका दहन में इसका इस्तेमाल श्रद्धा के साथ होता है और इसकी मांग इस मौसम में बढ़ जाती है.
ग्रामीण जीवन से जुड़ी परंपरा
अंबिकापुर के स्थानीय निवासी महेश ने लोकल 18 को बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में गोइठा बनाने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. घरों में पाले जाने वाले मवेशियों से निकलने वाले गोबर को हाथों से आकार देकर कंडे बनाए जाते हैं. यह काम खासतौर पर गर्मी की शुरुआत और होली से पहले बड़े पैमाने पर देखने को मिलता है.
धूप में सूखकर होते हैं तैयार
महेश के अनुसार, गोबर से बनाए गए कंडों को खुली धूप में रखा जाता है, जहां दो से तीन दिनों में वे पूरी तरह सूखकर उपयोग के लिए तैयार हो जाते हैं. सूखने के बाद गोइठा लंबे समय तक सुरक्षित रहता है और जरूरत पड़ने पर आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है.
शुद्धता और आस्था का प्रतीक
ग्रामीण मान्यताओं में गोइठा को पूरी तरह शुद्ध माना जाता है. इसका उपयोग घरों में खाना बनाने, हवन, पूजा-पाठ और विशेष रूप से होलिका दहन में किया जाता है. धार्मिक विश्वासों के अनुसार गोबर से गौरी-गणेश की पूजा भी की जाती है, जिससे इसका धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है.
मौसम के साथ बढ़ती मांग
इस मौसम में गोइठा की मांग भी बढ़ जाती है. महेश बताते हैं कि जिन घरों में गोइठा नहीं बनाया जाता, वहां के लोग आसपास के ग्रामीण इलाकों से इसे लेकर जाते हैं. खासकर होली के समय इसकी मांग चरम पर होती है.
शहरों में कम, गांवों में आज भी जीवित गोईठा
हालांकि शहरों में गैस और अन्य आधुनिक ईंधनों के चलते गोइठा का उपयोग कम हो गया है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ निभाई जाती है. गोइठा न सिर्फ ईंधन है, बल्कि ग्रामीण संस्कृति, पर्यावरण और धार्मिक विश्वासों से गहराई से जुड़ा हुआ प्रतीक भी है.
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Deepti Sharma, currently working with News18MPCG (Digital), has been creating, curating and publishing impactful stories in Digital Journalism for more than 6 years. Before Joining News18 she has worked with Re…और पढ़ें
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