भारतीय वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। राजस्थान केंद्रीय विश्वविद्यालय की शोध टीम ने एक नए प्रकार के कार्बन की पहचान की है, जिसे ‘टील कार्बन’ नाम दिया गया है। इसे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने वाला प्रभावी नेचर-बेस्ड सॉल्यूशन माना जा रहा है। प्रोफेसर डॉ. लक्ष्मीकांत शर्मा के नेतृत्व में यह रिसर्च केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर में की गई। शोध में सामने आया कि टील कार्बन हल्के आसमानी रंग का होता है और यह बड़ी मात्रा में कार्बन का दीर्घकालिक भंडारण करता है। शोध निष्कर्षों को हाल ही में कोलकाता में राष्ट्रीय सेमिनार में प्रस्तुत किया गया, जबकि इसका रिसर्च पेपर प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘साइंस ऑफ द टोटल एनवायर्नमेंट’ में प्रकाशित हुआ है। इसके बाद इस खोज को वैश्विक मान्यता मिली। कार्बन को लंबे समय तक संग्रहित करता है टील कार्बन टील कार्बन एक नया पहचाना गया कार्बन प्रकार है, जो वन-आधारित आर्द्रभूमियों में पाया जाता है। इसमें पानी, पेड़ और दलदली मिट्टी मिलकर ऐसा पारिस्थितिक तंत्र बनाते हैं, जो कार्बन को लंबे समय तक संग्रहित करता है। इन क्षेत्रों में तापमान अपेक्षाकृत कम रहता है और मीथेन का उत्सर्जन नियंत्रित रूप से होता है। टील कार्बन न केवल ग्रीनहाउस गैसों को संतुलित करता है, बल्कि मिट्टी के रासायनिक गुणों में भी सुधार करता है। यह भविष्य के जलवायु अनुकूलन का प्रभावी प्राकृतिक समाधान माना जा रहा है। तापमान नियंत्रण व बाढ़ रोकने में अहम भूमिका
टील कार्बन आधारित आर्द्रभूमियां शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में तापमान नियंत्रित करने, बाढ़ रोकने, भूजल स्तर सुधारने में अहम भूमिका निभा सकती हैं। यह शोध भारतीय विज्ञान में ग्राउंड-लेवल इनोवेशन और आत्मनिर्भर अनुसंधान क्षमता का बेहतरीन उदाहरण माना जा रहा है। दिल्ली में प्रदूषण संकट के नियंत्रण में मदद संभव रिसर्च के दौरान टीम के पास अत्याधुनिक मशीनें और पर्याप्त संसाधन नहीं थे। कम-लागत वाले विशेष उपकरण विकसित किए। इन्हीं से आर्द्रभूमियों में कार्बन और मीथेन प्रवाह का वैज्ञानिक आकलन किया गया। यह मॉडल दिल्ली जैसे महानगरों के प्रदूषण संकट का प्राकृतिक समाधान बन सकता है।
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