अतिवृष्टि के कारण हिमालय के ऊंचाई वाले बुग्याल क्षेत्रों में भू–क्षरण के साथ जगह छोटे-छोटे नाले बन जाते हैं। कई जगह भूस्खलन व मिट्टी कटाव से ये नाले गड्ढों में तब्दील हो जाते हैं। इससे पर्वतीय घास के मैदानों की सुंदरता और नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर भी असर होता है। इसको देखते हुए वन विभाग ने पंवाली कांठा क्षेत्र में 1000 वर्गमीटर बुग्याली क्षेत्र का ट्रीटमेंट किया है।
इसका उद्देश्य भूस्खलन एवं मिट्टी के कटाव से प्रभावित हिस्सों को पुनर्जीवित करना और बुग्यालों की प्राकृतिक बनावट को सुरक्षित रखना है। उपचार प्रक्रिया में विभाग ने पूरी तरह पर्यावरण अनुकूल तकनीकों का उपयोग किया है। वन विभाग की टीम ने ढलानों पर जियो-ज्यूट तकनीक अपनाई है, जिसमें नारियल और जूट के रेशों से निर्मित मैट बिछाए जाते हैं, ताकि कटाव रोका जा सके।
छोटे-छोटे चेक डैम भी तैयार किए गए
इसके साथ ही मिट्टी को थामने के लिए चीड़ की पत्तियों से भरे छोटे-छोटे चेक डैम भी तैयार किए गए हैं। इन उपायों से न केवल मिट्टी का कटाव कम होगा, बल्कि बुग्यालों की प्राकृतिक हरियाली भी अधिक तेजी से पुनर्जीवित होने की संभावना है।
वन विभाग अन्य संवेदनशील इलाकों में भी इसी तरह के उपायों से बुग्यालों का ट्रीटमेंट कर रहा है। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वनों और बुग्यालों के भौगोलिक परिवेश को बचाने के लिए विभिन्न सुरक्षात्मक उपायों से पर्यावरण को बचाया जा रहा है।
अतिवृष्टि के कारण पंवाली कांठा बुग्याल में 1000 मीटर स्क्वायर क्षेत्र में ढाल कटाव के साथ बुग्याल में बड़ी दरारें पड़ने लगी थी, जिसका ईको फ्रेंडली विधि से ट्रीटमेंट किया गया। यह दरारें अब भरने लगी हैं, जनपद के अन्य वन्य क्षेत्रों में स्थित बुग्यालों में भी इसी विधि से ट्रीटमेंट किया जा रहा है। – रजत सुमन, प्रभागीय वनाधिकारी रुद्रप्रयाग
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