सीतामढ़ी जिले के सोनबरसा प्रखंड अंतर्गत पुरंदाहा राजवाड़ा पश्चिमी पंचायत में पंचायत सचिव की एक गलती ने उनके बुढ़ापे का सहारा छीन लिया और वृद्धावस्था पेंशन बंद हो गई. अब ये बुजुर्ग ठंड की सर्द रातों में दाने-दाने को तरस रहे हैं. उनका दर्द सुनकर दिल पसीज जाता है. उनकी बातों को सुनकर तब दिल भर आता है जब वह भावुक होकर कहते हैं … देखिए साहब, मैं जिंदा हूं, लेकिन कागजों में मुझे मरा हुआ लिख दिया गया है.”
सीतामढ़ी में सरकारी लापरवाही ने छीन लिया सहारा
मामला तब उजागर हुआ जब इन बुजुर्गों के बैंक खातों में महीनों से पेंशन नहीं आई. वे बैंक पहुंचे तो पता चला कि रिकॉर्ड में वे मृत हैं. पेंशन सत्यापन के नाम पर पंचायत सचिव ने बिना जांच-पड़ताल के रिपोर्ट में लिख दिया कि लाभार्थी जांच के दौरान मृत पाए गए. कोई घर जाकर नहीं देखा, कोई पूछताछ नहीं की… बस, एक कलम की नोंक ने उनकी जिंदगी उलट दी. प्रभावितों में जोत देवी और उनके पति गोनू महतो, जयवीर पासवान और राजकुमारी देवी जैसे लोग शामिल हैं. ये सभी 60-70 साल के बुजुर्ग हैं, जिनके लिए 400-500 रुपये की मासिक पेंशन ही जीवन का आधार थी. मगर अब बिना पैसे के दवा और राशन, सब मुश्किल हो गया है.
सीतामढ़ी सोनबरसा के बुजुर्गों की पेंशन पंचायत सचिव की गलती से बंद, सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित. प्रशासनिक लापरवाही पर उठे सवाल.
जीवित होने के सबूत लेकर दर-दर भटक रहे बुजुर्ग
पीड़ित बुजुर्ग अब प्रखंड मुख्यालय के चक्कर काट रहे हैं. हाथों में आधार कार्ड, वोटर आईडी जैसे जीवित होने के प्रमाण लेकर अधिकारियों से गुहार लगा रहे हैं. एक बुजुर्ग रोते हुए कहते हैं, ” ऐ साहब, ठीक नहीं है ये. हमारी पेंशन ही सब कुछ थी, अब कैसे जिएं?” कड़ाके की ठंड में ये दृश्य दिल दहला देते हैं. परिवार के सदस्य भी परेशान हैं, क्योंकि इन बुजुर्गों की देखभाल के लिए अब अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ रही है. पंचायत सचिव की इस लापरवाही पर सवाल उठ रहे हैं. स्थानीय लोग कहते हैं कि ऐसे मामलों में धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज होना चाहिए, ताकि आगे ऐसी भूल न हो.
वृद्धावस्था पेंशन बंद होने से ठंड में मोहताजी की नौबत
समाज कल्याण विभाग के अधिकारी मामले की जांच की बात कर रहे हैं, लेकिन बुजुर्गों को तत्काल राहत कब मिलेगी, यह सवाल बड़ा है. डीएम कार्यालय तक शिकायत पहुंच चुकी है और उम्मीद है कि जल्द सुधार होगा. लेकिन, तब तक इनकी जिंदगी का क्या? बहरहाल, यह घटना न केवल बिहार में प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि कर्मचारियों की कार्यशैली को भी कटघरे में खड़ा करती है. जहां गरीबों की योजनाएं उनके लिए सहारा बननी चाहिए वहां लापरवाही उन्हें और तोड़ रही है. इन बुजुर्गों की आंखों में आस है कि साहब सुनेंगे और कागजों की मौत हटाकर जिंदगी लौट आएगी.
आज ये बुजुर्ग आधार कार्ड और वोटर आईडी लेकर दफ्तर-दफ्तर भटक रहे हैं, ताकि यह साबित कर सकें कि वे जिंदा हैं. समाज कल्याण विभाग जांच की बात कर रहा है, लेकिन सवाल यह है कि तब तक इन बुजुर्गों का क्या होगा? यह मामला सिर्फ पेंशन बंद होने का नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता का आईना है. कागजों में दी गई “मौत” जब जिंदा इंसानों को ठंड और भूख के हवाले कर दे, तो यह प्रशासन के लिए बड़ी चेतावनी है. अब देखना है कि क्या सरकार इनकी जिंदगी को कागजों से वापस ला पाएगी. क्या प्रशासन अब जागेगा? समय बताएगा, लेकिन इनका दर्द बेहद दर्द दे रहा है.
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