भरतपुर का केवलादेव घना पक्षी विहार कभी साइबेरियन सारस के लिए जाना जाता था। पिछले 25 साल से यहां एक भी साइबेरियन सारस नहीं आया है। अंतिम बार 2001 में एक जोड़ा साइबेरिया से भरतपुर आया था। वो वापस साइबेरिया नहीं लौट पाया। उसे भी रास्ते में ही मार दिया गय
इस रिपोर्ट में पढ़िए साइबेरियन सारस की भरतपुर तक 6 हजार किमी की उड़ान क्यों रुकी…
2001 के बाद एक भी साइबेरियन सारस भरतपुर के केवलादेव घना पक्षी विहार में नहीं आया है।
आशंका- शिकार के डर से पक्षियों ने रास्ता बदला रिटायर्ड रेंजर भोलू अबरार खान बताते हैं- साइबेरिया से भरतपुर आने वाले सारस अब यहां नहीं आते। या तो वे कहीं और जाने लगे हैं या फिर शिकार के डर से उन्होंने रास्ता बदल लिया है।
इसके लिए समझना पड़ेगा कि उनका रूट क्या होता है। साइबेरिया से उड़कर ये सारस, रूस, कजाकिस्तान, उज्बेकिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान से होते हुए भरतपुर तक आते थे। ये पक्षी जमीन से 30 हजार फीट (लगभग 1000 मीटर) ऊंचा उड़ते हैं। इनकी उड़ने की रफ्तार 40 किमी प्रति घंटा के हिसाब से होती है। ऐसे में ये पक्षी करीब 1 महीने में यहां पहुंच पाते थे।
90 के दशक में इनके आने की संख्या धीरे-धीरे कम होने लगी। जब जांच की तो पता चला कि अफगानिस्तान के इलाके में शिकारी मनोरंजन और मांस के लिए इन पक्षियों को मारने लगे हैं। 2001 में लास्ट जोड़ा यहां आया, जो साइबेरिया नहीं पहुंचा।

25 साल पहले 2 जोड़े यहां आए थे। वे दोबारा साइबेरिया पहुंचे ही नहीं।
ईरान जाने वाले सारस भी खतरे में खान बताते हैं- साइबेरियन क्रेन की तीन पॉपुलेशन हैं। पहली सेंट्रल पॉपुलेशन, दूसरी वेस्टर्न पॉपुलेशन और तीसरी ईस्टर्न पॉपुलेशन। इसमें से सेंट्रल पॉपुलेशन भरतपुर आया करती थी। ऐसे में सेंट्रल पॉपुलेशन की संख्या हर साल कम होती गई। अब ये 5 हजार के करीब ही बचे हैं।
वेस्टर्न पॉपुलेशन भी ईरान जाती है। अफगानिस्तान में ही शिकार होने के कारण ईरान जाने वाली साइबेरियन सारस भी बेहद कम रह गए हैं। ईस्टर्न पॉपुलेशन ईस्ट साइबेरिया में रहती है। वह चाइना जाती है। उसकी साइबेरियन क्रेन की जनसंख्या काफी है। उनकी जनसंख्या करीब 5 हजार है। चाइना में कोई साइबेरियन क्रेन का शिकार भी नहीं करता है। उनका ब्रीडिंग एरिया भी वहां बहुत अच्छा है।

अफगानिस्तान में शिकार होने के चलते साइबेरियन क्रेन अब लुप्त होने की कगार पर है।
खाने की तलाश में घना पहुंचते हैं पक्षी खान बताते हैं- केवलादेव नेशनल पार्क में पिछले 2 साल काफी पानी आया है। इसलिए नेशनल पार्क में पक्षियों के आने में कोई कमी नहीं रही। पक्षियों के खाने के लिए फिश फ्रॉग स्निल पानी में पर्याप्त मात्रा में है। इसे पक्षी अपना भोजन बनाते हैं। केवलादेव नेशनल पार्क में कई साल से हजारों पक्षी आते हैं। इन्हें पर्यटक पास से ही देख लेता है। साइबेरिया सेंट्रल ईयर से आने वाले पक्षियों को खाने वाले ईगल हैं। जब पक्षियों को खाने के लिए साइबेरिया में कुछ नहीं रहता तब वह केवलादेव नेशनल पार्क में आते हैं।

ये पक्षी करीब 1000 मीटर की ऊंचाई पर उड़कर साइबेरिया से अलग-अलग देशों में आते हैं।
हिमाचल प्रदेश से पक्षी ब्रीड करने आते हैं खान बताते हैं- ठंडे देशों में जब बर्फ जम जाती है और पक्षियों के खाने के लिए कुछ नहीं रहता तो, पक्षी लाखों किलोमीटर के दूरी तय कर केवलादेव नेशनल पार्क में आते हैं। इस साल केवलादेव नेशनल पार्क की वेट लैंड में हजारों पक्षी आए हुए हैं। इंडियन पिक (नवरंग पक्षी) नेशनल पार्क में ब्रीड करता है। वह हिमाचल प्रदेश से आता है। उसके बारे में काफी कम लोग जानते हैं। अगर केवलादेव में समय-समय पर पानी आता रहा तो, यहां पक्षी आते रहेंगे।

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