आदिवासी इलाकों में तीर-धनुष का इस्तेमाल मुख्य रूप से आत्मरक्षा के लिए किया जाता है. जंगलों में रहने के दौरान जंगली जानवरों से सुरक्षा खेती-बाड़ी के समय फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले पशुओं को भगाने और खुद की रक्षा के लिए पारंपरिक हथियार कारगर साबित होता है
आदिवासी इलाकों में तीर-धनुष का इस्तेमाल मुख्य रूप से आत्मरक्षा के लिए किया जाता है. जंगलों में रहने के दौरान जंगली जानवरों से सुरक्षा, खेती-बाड़ी के समय फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले पशुओं को भगाने और आपात स्थिति में खुद की रक्षा के लिए यह पारंपरिक हथियार आज भी कारगर साबित होता है. कई बुजुर्गों का कहना है कि तीर-धनुष उन्हें साहस और आत्मविश्वास देता है.
युवक करते है तीर-धनुष लेकर नृत्य
त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में भी तीर-धनुष का विशेष महत्व है. सरहुल, करम, सोहराय जैसे पर्वों में युवक-युवतियां पारंपरिक वेशभूषा के साथ तीर-धनुष लेकर नृत्य करते हैं, जो उनकी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाता है. वहीं, गांवों में बच्चों को कम उम्र से ही तीर चलाने की कला सिखाई जाती है, ताकि वे अपनी परंपरा से जुड़े रहें.
सरहुल में दिखी आदिवासी संस्कृति की झलक
आजकल आदिवासी युवाओं में भी तीर-धनुष को लेकर नया क्रेज देखने को मिल रहा है. कई जगहों पर पारंपरिक तीरंदाजी प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं, जिससे यह कला खेल के रूप में भी पहचान बना रही है. आदिवासी समाज का मानना है कि तीर-धनुष उनकी आज़ादी, जंगल और प्रकृति से जुड़ाव का प्रतीक है, जिसे वे किसी भी हाल में खोने नहीं देना चाहते. साहिबगंज के खेला मुर्मू ने बताया कि सोहराय पर्व को लेकर उन्होंने इस तीर धनुष को निकाला है. जिसे त्यौहार के दरमियाँ नृत्य में इस्तेमाल करेंगे और इसकी पूजा भी की जाएगी.
Discover more from India News
Subscribe to get the latest posts sent to your email.