हाई कोर्ट ने प्रदेश के 93 बजरी खनन पट्टों की लीज को समाप्त कर दिया हैं। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने यह आदेश डॉ. बृजमोहन सपूत कला संस्कृति सेवा संस्थान की जनहित याचिका को स्वीकार करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि नियमानुसार एक बार खनन की अवधि पूरी होने के बाद वहां अगले पांच साल खनन नहीं हो सकता है। इसके बावजूद राज्य सरकार ने 12 से 100 हेक्टेयर तक के छोटे ब्लॉक बनाकर पुराने खनन क्षेत्रों को फिर से नीलाम कर दिया। इस पर कोर्ट प्रदेश के 93 बजरी खनन पट्टों के ई-नीलामी आदेश को रद्द कर दिया। सुप्रीम कोर्ट और केन्द्रीय एंपावरमेंट कमेटी की अवहेलना की
जनहित याचिका में वरिष्ठ अधिवक्ता कमलाकर शर्मा और अधिवक्ता अलंकृता शर्मा ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और केन्द्रीय एंपावरमेंट कमेटी की सिफारिश की अवहेलना करते हुए इन खनन पट्टों के ई-नीलामी निकाली। सुप्रीम कोर्ट ने साल 2021 में सीईसी की रिपोर्ट को मंजूरी दी थी, जिसमें स्पष्ट प्रावधान किया था कि एक बार खनन अवधि पूरी होने के बाद वहां अगले पांच साल के लिए खनन काम नहीं होगा। जिससे इस अवधि में नदी में प्राकृतिक रूप से बजरी का पुनर्भरण हो सके। तेजी से भूजल स्तर भी गिर रहा
याचिका में कहा गया कि इससे नदी का तल गहरा हो रहा है और भूजल स्तर भी तेजी से गिर रहा है। वहीं नदी किनारे की जमीन बंजर हो रही है। याचिका में कहा गया कि प्रदेश में सालभर चलने वाली नदियां नहीं हैं। जिससे मानसून में भी इनका पूरी तरह से पुनर्भरण नहीं होता। वहीं अत्यधिक खनन से मछली पालन स्थल भी समाप्त हो रहे हैं। सरकार बताए बजरी पुर्नभरण कैसे होगा
इसके साथ ही अदालत ने राज्य सरकार को रिपोर्ट तैयार करने को कहा है कि जिस स्थान से बजरी निकाली जाएगी, वहां बजरी का पुनर्भरण कैसे होगा। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार यह रिपोर्ट हाईकोर्ट में पेश करे और चाहे तो मामले में सुप्रीम कोर्ट में लंबित याचिका में इस रिपोर्ट को रखे।
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