शाबीर की गेंदों में उस दिन कुछ खास था. एक के बाद एक मणिपुर के बल्लेबाज पवेलियन लौटते गए और बिहार की टीम मज़बूत स्थिति में आ खड़ी हुई. इस मैच में शाबीर ने हैट्रिक समेत कुल 07 विकेट चटके. दर्शक और साथी खिलाड़ी जश्न में डूबे थे, लेकिन खुशी के उसी पल में शाबीर खुद को रोक नहीं पाए और मैदान पर ही उनकी आंखों से आंसू बह निकले.
मैच के बाद जब शाबीर बिहार लौटे तो लोकल 18 से खास बातचीत में उन्होंने अपने आंसुओं का कारण बताया. उन्होंने कहा कि गेंदबाजी करते वक्त हर गेंद के साथ उनके दिल में अपने मरहूम पिता की यादें उमड़ रही थीं. “हैट्रिक लेने के बाद मैं इसलिए टूट गया, क्योंकि यह मेरे करियर का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन था, लेकिन आज मेरी इस खुशी को साझा करने वाले मेरे पिता इस दुनिया में नहीं हैं”. यह कहते हुए शाबीर भावुक हो गए.
खुद को साबित करने का बेहतरीन मौका
लोकल 18 के बातचीत करते हुए हैं शाबीर बताते हैं कि मेरे कैरियर में काफी उतार चढ़ाव रहा है. यह मेरे पास खुद को साबित करने का बेहतरीन मौका था. शुरुआती मैच में कुछ खास विकेट नहीं मिल रहे थे लेकिन पॉजिटिव गेंदबाजी हो रही थी. कोच से लेकर कप्तान तक सबको मुझपर विश्वास था. इसी उम्मीद पर खड़ा उतरने और खुद की काबिलियत साबित करने की सोच के साथ मैदान में उतरा था. उन्होंने आगे बताया कि उस मैच में बाद कॉन्फिडेंस काफी बढ़ा है. रणजी फाइनल मुकाबले में भी जगह मिली है. बिहार क्रिकेट एसोसिएशन से लेकर टीम मेंबर सबसे अच्छा रिस्पांस मिल रहा है. बीसीए ने लगातार मौका दिया, उनका शुक्रगुजार हूं.
एक महीने पहले ही हुआ पिता का इंतकाल
शाबीर खान सिवान जिले के हरनाटाड़ गांव के रहने वाले हैं. उनके परिवार में अम्मी और एक भाई हैं. करीब 40 से 45 दिन पहले शाबीर ने अपनी सबसे अजीज शख्सियत, अपने पिता को खो दिया. उन्होंने बताया कि उनके क्रिकेट करियर में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन हर मुश्किल घड़ी में पिता हमेशा ढाल बनकर उनके साथ खड़े रहे. शाबीर कहते हैं कि कुछ दिनों पहले पिता का इंतकाल हो जाना उनके जीवन का सबसे खराब दिन साबित हुआ. उस दौर में कई परेशानियां आईं, लेकिन अल्लाह की मर्जी मानकर उन्होंने अपने जीवन में आगे बढ़ने का फैसला किया.
उन्होंने कहा, “मुझे कभी नहीं लगा था कि मैं दोबारा रणजी ट्रॉफी में वापसी कर पाऊंगा, लेकिन विजय हजारे ट्रॉफी के एक मैच में किए गए प्रदर्शन ने मुझे रणजी ट्रॉफी के फाइनल मुकाबले में खेलने का मौका दिला दिया.”
ट्रायल से पहले पिता का निधन
शाबीर ने भावुक लहजे में बताया कि जब उनके पिता का इंतकाल हुआ, उस समय वह टीम में नहीं थे. पिता के निधन के महज दो दिन बाद मुश्ताक अली ट्रॉफी का ट्रायल होना था. ऐसे गहरे दुख के बीच जब वह ट्रायल देने पहुंचे, तो गेंद फेंकने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाए. पिता की यादें लगातार आंखों के सामने घूम रही थीं और हर गेंद फेंकते वक्त आंखों से आंसू निकल रहे थे. यही वजह रही कि ट्रायल अच्छा नहीं गया और उनका चयन भी नहीं हो सका.
शाबीर ने आगे कहा कि इसके बाद उन्होंने खुद को संभाला और मानसिक रूप से मजबूत बनने की कोशिश की. इस मुश्किल दौर में मां से बातचीत ने उन्हें बहुत हिम्मत दी. उन्होंने कहा, “पापा की ख्वाहिश थी कि मैं एक अच्छा क्रिकेटर बनूं. उसी ख्वाहिश को पूरा करने के इरादे से मैंने विजय हजारे ट्रॉफी के लिए खुद को तैयार किया.” उन्होंने बताया कि विजय हजारे ट्रॉफी का ट्रायल इस बार अच्छा रहा और टीम में चयन हो गया. शाबीर कहते हैं,”मैंने खुद से यह ठान लिया था कि अब पापा इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन मुझे उनके लिए ही खेलना है.” इसी सोच और मजबूत माइंडसेट के साथ उन्होंने विजय हजारे ट्रॉफी में गेंदबाजी की.
दो सालों से था टीम से बाहर
शाबीर ने कहा कि विजय हजारे ट्रॉफी उनके लिए बेहद अहम थी, क्योंकि पिता के निधन के बाद वह अपने जीवन और क्रिकेट करियर दोनों में वापसी कर रहे थे. उन्होंने बताया कि इससे पहले वे करीब दो साल तक बिहार टीम से बाहर रहे थे. ऐसे में उनके पास अच्छा प्रदर्शन करने के अलावा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं था. शुरुआती मुकाबलों में उनका प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. फाइनल मुकाबले में किए गए शानदार प्रदर्शन की बदौलत आज उन्हें रणजी ट्रॉफी का फाइनल खेलने का मौका मिल रहा है.
हैट्रिक लेने के बाद फूट-फूट कर रो पड़े शाबीर
शाबीर ने बताया कि जब वह फाइनल मुकाबले में गेंदबाजी कर रहे थे, तो हर पल पिता की बातें और उनके साथ बिताए हुए पल आंखों के सामने घूम रहे थे. उन्होंने कहा, “जब मैंने पांच विकेट लिए तो सबसे पहले यही ख्याल आया कि पापा कॉल करेंगे और कहेंगे, बाबू, कैसा रहा मैच? लेकिन उसी पल यह एहसास हो गया कि आज मैंने इतना अच्छा प्रदर्शन किया है, फिर भी पापा का फोन अब कभी नहीं आएगा.”
शाबीर आगे कहते हैं, “हर मैच के बाद पापा जरूर फोन करके पूछते थे, बेटा, कैसा रहा मैच? आज वो पूछने वाला कोई नहीं है. यह बात मुझे अंदर तक तोड़ देती है.” इन्हीं भावनाओं के बीच हैट्रिक लेने के बाद शाबीर खुद को संभाल नहीं पाए और मैदान पर ही फूट-फूट कर रो पड़े.
कैसा रहा सीवान से पटना तक का सफर
शाबीर अपने क्रिकेट सफर के बारे में बताते हुए कहते हैं कि शुरुआती दिनों में उनके चाचा स्वर्गीय शरीफ खान जी का सपना था कि भतीजा क्रिकेट खेले. जब वे गांव से जिला मुख्यालय आए तो शुरुआत में किराए के मकान में रहना पड़ा. बाद में धीरे-धीरे मेहनत के दम पर अपना घर भी बना.
शाबीर ने सिवान के राजेंद्र स्टेडियम स्थित कैफ क्रिकेट एकेडमी जॉइन की और वहीं से क्रिकेट की बारीकियां सीखनी शुरू की. एकेडमी के कोच मोहम्मद कैफ ने उनके खेल पर काफी काम किया और उन्हें बहुत कुछ सिखाया. इसके बाद उन्होंने लीग मुकाबले खेले, फिर जिला स्तर पर खेलने का मौका मिला. साल 2018 में उनका चयन बिहार की अंडर-23 टीम में हुआ. इस टूर्नामेंट में उन्होंने शानदार प्रदर्शन करते हुए सबसे ज्यादा विकेट लिए. गेंदबाजी के साथ-साथ बल्लेबाजी में भी उन्होंने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा. इसके बाद बिहार क्रिकेट एसोसिएशन की ओर से उन्हें पहली बार रणजी ट्रॉफी खेलने का मौका मिला. हालांकि सिर्फ एक मैच खेलने के बाद चोट के कारण उन्हें टीम से बाहर होना पड़ा.
इसके बाद विजय हजारे ट्रॉफी में उन्होंने कमबैक किया, लेकिन शुरुआती प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा. इसके बावजूद बीसीए ने उन पर लगातार भरोसा जताया और टीम में शामिल करते रहे. नतीजन उनके प्रदर्शन में सुधार आया और इस साल का प्रदर्शन सबके सामने है. अब एक बार फिर बिहार क्रिकेट एसोसिएशन ने उन्हें रणजी ट्रॉफी में खेलने का मौका दिया है. शाबीर कहते हैं,”मैं बीसीए का धन्यवाद करना चाहूंगा कि रणजी फाइनल मुकाबले से लगभग एक हफ्ते पहले कैंप का आयोजन किया गया है. इससे हम सभी खिलाड़ी जी-तोड़ मेहनत के साथ प्रेक्टिस कर रहे हैं. अभी हम व्हाइट बॉल क्रिकेट खेलकर आ रहे हैं और अचानक रेड बॉल से खेलना है. ऐसे में ये सात दिन की प्रैक्टिस हमें रेड बॉल की आदत डालने में काफी मदद करेगी और इसका असर मैच में भी दिखेगा. सभी खिलाड़ी पॉजिटिव माइंडसेट के साथ फाइनल मुकाबला खेलेंगे और जीतने की पूरी कोशिश करेंगे, ताकि एलीट ग्रुप में बेहतर प्रदर्शन के जरिए आगे का चयन आसान हो सके.”
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