पटना. मुगल बादशाह औरंगजेब (Mughal Emperor Aurangzeb) भारतीय इतिहास के सबसे जटिल शासकों में गिने जाते हैं. उनके शासनकाल में साम्राज्य का विस्तार चरम पर पहुंचा, लेकिन धार्मिक और सामाजिक तनाव भी अपनी अंतिम सीमा तक बढ़े. लेकिन वह अपने बारे में क्या सोचते थे, क्या उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा भी था, क्या उन्होंने अपने जीवन के बारे में आत्ममंथन करने के बाद क्या उन्होंने इसे जाहिर भी किया था? ऐसे ही सवालों के जवाब के लिए उनके शासनकाल को लेकर उनका आखिरी खत एक दस्तावेज की तरह सामने आता है, जिसमें एक बादशाह अपने जीवन का हिसाब खुद से मांगता दिखाई देता है. इस पत्र को लेकर दावा किया जाता है कि उसमें उन्होंने अपने जीवन, अपने कर्मों और अपने गुनाहों पर आत्ममंथन किया था. औरंगजेब की मृत्यु 1707 में हुई और अपने अंतिम समय में उन्होंने अपने बेटों को पत्र लिखे थे. इन पत्रों का उल्लेख कई ऐतिहासिक स्रोतों और साहित्यिक कृतियों में मिलता है. हिंदी साहित्यकार राम कुमार वर्मा की पुस्तक औरंगजेब की आखिरी रात में इस खत का मार्मिक वर्णन मिलता है.
आखिरी खत में क्या लिखा था?
इतिहासकारों के अनुसार, औरंगजेब ने अपने अंतिम समय में अपने बेटों आजम शाह और काम बख्श को पत्र लिखे थे. इन पत्रों में उन्होंने अपने जीवन को लेकर गहरी निराशा, आत्मचिंतन और आत्ममंथन व्यक्त किया. किताब औरंगजेब की आखिरी रात में लेखक राम कुमार वर्मा ने उस खत का मजमून विस्तार से दिया है. उसमें औरंगजेब खुद को बूढ़ा, कमजोर और पापों का बोझ ढोता हुआ बताते हैं. वह लिखते हैं कि वह नहीं जानते कि उन्होंने दुनिया में क्या हासिल किया और लोगों के लिए क्या भला किया. कुछ ऐतिहासिक स्रोतों में दर्ज है कि उन्होंने लिखा कि वह खाली हाथ आए थे, लेकिन अब पापों का बोझ लेकर जा रहे हैं. उन्हें डर था कि अल्लाह उनके कर्मों का हिसाब लेगा. यह भाषा एक अपने किए कर्मों के पछतावे और उसके आत्मस्वीकार की तरह लगती है. हालांकि, इतिहासकार इस बात पर एकमत नहीं हैं कि यह शब्दशः वही पत्र है या बाद की व्याख्या.
मरने से पहले औरंगजेब ने खुद को बताया गुनाहगार, इतिहास में दर्ज पत्र
हिंदुओं पर नीतियां और विवाद
ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसा, औरंगजेब के शासनकाल 1658 से 1707 तक में मुगल साम्राज्य का क्षेत्रफल सबसे ज्यादा फैला. लेकिन इसी दौर में उनकी नीतियों को लेकर सबसे ज्यादा आलोचना भी हुई. उन्होंने 1679 में जजिया कर फिर से लागू किया, जिसे गैर मुस्लिमों पर लगाया जाता था. उनके शासनकाल में कई मंदिरों को तोड़े जाने के आदेश भी दर्ज हैं, जिनमें काशी और
मथुरा के प्रमुख मंदिरों का उल्लेख इतिहास में मिलता है. सिख इतिहास में गुरु तेग बहादुर की हत्या और मराठा इतिहास में संभाजी महाराज के साथ की गई कठोरता का जिक्र मिलता है. इन घटनाओं ने उनकी छवि को कठोर और असहिष्णु शासक के रूप में स्थापित किया. हालांकि कुछ इतिहासकार यह भी तर्क देते हैं कि उनके कई फैसले राजनीतिक थे, केवल धार्मिक नहीं.
पिता के साथ व्यवहार
औरंगजेब के पिता शाहजहां (Aurangzeb father Shahjahan) थे. सत्ता संघर्ष में औरंगजेब ने अपने पिता को
आगरा किले में नजरबंद कर दिया था. यह घटना भी उनके व्यक्तित्व को लेकर सवाल खड़े करती है. इतिहास में यह दर्ज है कि उत्तराधिकार की लड़ाई में उन्होंने अपने भाइयों को हराकर सत्ता संभाली. उनके तीन बेटों के बीच भी उनकी मृत्यु के बाद संघर्ष हुआ. अंततः मुहम्मद मुअज्जम गद्दी पर बैठे थे जो बाद में बहादुर शाह प्रथम कहलाए.
क्या सचमुच पछताए थे औरंगजेब, आखिरी खत में क्या लिखा था?
सादा मकबरा और अंतिम इच्छा
1707 में उनकी मृत्यु के बाद उन्हें
महाराष्ट्र के खुल्दाबाद में दफनाया गया. उनका मकबरा बेहद सादा है. कहा जाता है कि उन्होंने अपनी कब्र सादगी से बनाने की इच्छा जताई थी. उनकी यह सादगी और आखिरी खत का स्वर, दोनों मिलकर एक ऐसे शासक की तस्वीर पेश करते हैं जो जीवन के अंत में आत्ममंथन में डूबा हुआ था. हालाकि, इतिहासकारों के बीच यह बहस जारी है कि औरंगजेब का आखिरी खत सच्चा पश्चाताप था या एक धार्मिक चिंतन.
पछतावा या आध्यात्मिक चिंतन
कई इतिहासकारों के अनुसार, कई इस्लामी शासक अपने अंतिम समय में खुद को गुनाहगार बताते हुए ईश्वर से क्षमा मांगते थे. इसलिए इसे परंपरा का हिस्सा भी माना जाता है. लेकिन यह भी सच है कि उनके शासनकाल की नीतियों ने भारतीय समाज पर गहरा असर छोड़ा. जजिया, मंदिर विध्वंस और सख्त धार्मिक कानूनों ने उनकी छवि को स्थायी रूप से विवादित बना दिया. यही कारण है कि औरंगजेब भारतीय इतिहास के सबसे जटिल और विवादित शासकों में से एक हैं.
आखिरी चिट्ठी में औरंगजेब का इकबाल ए जुर्म, क्या कहते हैं इतिहासकारों के दो मत.
औरंगजेब के शासनकाल में साम्राज्य का विस्तार भी हुआ और सामाजिक तनाव भी बढ़ा. उनके आखिरी खत के शब्द चाहे पूर्ण ऐतिहासिक प्रमाण के साथ स्वीकार किए जाएं या नहीं, लेकिन यह संकेत जरूर देते हैं कि जीवन के अंत में उन्होंने अपने कर्मों पर विचार किया था. आज जब राजनीति में उनका नाम फिर चर्चा में है. औरंगजेब के बारे में अंतिम निर्णय देना आसान नहीं है, लेकिन इतना तय है कि उनका जीवन और उनका आखिरी खत, दोनों इतिहास की बहस को हमेशा जिंदा रखेंगे.