Dharohar: झारखंड के गढ़वा जिले में स्थित सतबहिनी झरना तीर्थ स्थल प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक आस्था का ऐसा अनोखा संगम है, जो वर्षों से श्रद्धालुओं और पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता आ रहा है
करीब 300 साल से भी अधिक पुराने इतिहास वाला सतबहिनी झरना 30 फीट की ऊंचाई से गिरते दूधिया पानी के कारण बेहद मनोहारी दृश्य प्रस्तुत करता है. खासकर बारिश और सर्दियों के मौसम में जब झरना पूरे वेग से बहता है, तब यहां की खूबसूरती देखते ही बनती है. हरियाली से घिरे पहाड़, ठंडी हवा और झरने की कलकल ध्वनि पर्यटकों को एक अलग ही अनुभूति प्रदान करती है.
सतयुग की कथा से जुड़ा सतबहिनी झरना
इस स्थल का नाम “सतबहिनी” सात बहनों की पौराणिक कथा से जुड़ा हुआ है. मान्यता है कि सतयुग के अंत में यहां सात बहनें सती हो गई थीं, जिसके कारण इस स्थान को सतबहिनी कहा जाने लगा. पुजारियों के अनुसार यह भूमि तपोभूमि रही है, जहां प्राचीन काल में ऋषि-महर्षि तपस्या किया करते थे.मंदिर के पुजारी हरिहर दास बताते हैं कि यहां श्याम दास बाबा का प्राचीन समाधि स्थल भी मौजूद है. श्याम दास बाबा ने करीब 250 साल पहले यहीं समाधि ली थी. उसी समय से यह स्थान धीरे-धीरे प्रसिद्ध होता गया. आज सतबहिनी झरना मंदिर के नाम से जाना जाता है. वहीं पुजारी प्रवीण पांडे के अनुसार मंदिर और आसपास का क्षेत्र करीब 24 से 25 एकड़ में फैला हुआ है.
सात खटिया गहराई से नाम से जाना जाता
मंदिर परिसर में लक्ष्मी, सरस्वती, काली, गणेश, हनुमान, भैरव बाबा सहित कई देवी-देवताओं के दरबार स्थापित हैं. मुख्य गर्भगृह में सतबहिनी माता विराजमान हैं, जहां श्रद्धालु मन्नतें मांगने और पूजा-अर्चना के लिए दूर-दूर से पहुंचते हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि झरने के नीचे पानी बेहद गहरा है, जिसे “सात खटिया गहराई” के नाम से जाना जाता है.आज सतबहिनी झरना तीर्थ स्थल न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि प्रकृति प्रेमियों और पर्यटकों के लिए भी एक आकर्षक पर्यटन स्थल बन चुका है, जहां आस्था और सौंदर्य एक साथ अनुभव किए जा सकते हैं. मान्यता है कि यहां मांगी हुई हर मुराद पूरी होती है.
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