उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 की धारा 2(28) के तहत कोई भी ऐसा विज्ञापन जो किसी उत्पाद की गुणवत्ता, प्रकृति या उससे मिलने वाले लाभ के बारे में गलत जानकारी देता है, वह ‘भ्रामक विज्ञापन’ की श्रेणी में आता है। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा कि उत्पाद की वास्तविकता विज्ञापन में दिखाए गए दृश्यों और दावों से बिल्कुल अलग है। यह न केवल नैतिकता के खिलाफ है, बल्कि करोड़ों उपभोक्ताओं के अधिकारों का हनन भी है।
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उन्होंने उपभोक्ता कोर्ट में परिवाद दर्ज कराया इसमें प्रारंभिक तौर पर कोर्ट ने मामले को सही पाया और अनुसंधान लेकर नोटिस जारी कर जवाब देने को कहा है। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया एडवोकेट के तथ्य में सच्चाई पाई और मामले को विचारार्थ स्वीकार कर लिया। इसके बाद कोर्ट ने सभी पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। अदालत अब इस बात की जांच करेगी कि क्या कंपनी द्वारा किए गए दावे वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हैं या वे केवल ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए फैलाया गया एक भ्रम है।
एक माह का समय दिया
आज गुरुवार को जानकारी देते हुए झालावाड़ निवासी एडवोकेट गुरचरण सिंह ने बताया कि 20 जनवरी को परिवाद पेश किया गया था, कोर्ट में तथ्यों की जांच के बाद 12 फरवरी को कोर्ट की ओर से नोटिस जारी किए गए, इसके बाद डाक के माध्यम से भेजने की कार्रवाई की गई है, इस दौरान एक माह का समय नोटिस में दिया गया है।
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