नैनीताल की वादियों में सिर्फ झील और पहाड़ ही नहीं, बल्कि ‘शेर का डांडा’ पहाड़ी पर एक ऐसा सुकून भरा कोना भी है, जिसका नाता सीधे भूटान के राजघराने से है. 1976 में एक रानी के दान से शुरू हुई यह बौद्ध मॉनेस्ट्री आज देश की उन चुनिंदा जगहों में से है, जहां एक साथ 1000 बुद्ध प्रतिमाएं मौजूद हैं. यहां की सुनहरी छत और हवा में लहराते रंग-बिरंगे झंडे सैलानियों को वो शांति देते हैं, जो शहर के शोर-शराबे में कहीं खो गई है. जानिए उस मठ की कहानी, जिसे बनाने के लिए लोगों ने बैंक से लोन तक लिया था. अगर आप कभी नैनीताल घूमने आएं तो इस ऐतिहासिक स्थल का दीदार जरूर करें.
इस मॉनेस्ट्री की खास बात यह है कि इसका संबंध भूटान के शाही परिवार से जुड़ा माना जाता है. तिब्बती समुदाय नैनीताल के अध्यक्ष याशी थूपतेन बताते हैं कि, इस बौद्ध मठ की स्थापना साल 1976 में हुई थी. उन्होंने बताया कि जिस भूमि पर आज यह मठ स्थित है, वह कभी भूटान की रानी की थी. बाद में रानी ने यह जगह नैनीताल के तिब्बती और भोटिया समुदाय को दान में दे दी, जिसके बाद यहां बौद्ध मठ की स्थापना की गई.
देश की पहली मॉनेस्ट्री में रखी गई 1000 बौद्ध प्रतिमाएं
याशी थूपतेन बताते हैं कि शुरुआत में यहां टिन और लकड़ी से एक अस्थायी मठ बनाया गया था. उस समय भारत में पहली बार इस स्थान पर भगवान बुद्ध की 1000 मूर्तियां स्थापित की गई थीं. खास बात यह रही कि इन मूर्तियों को खरीदने के लिए स्थानीय लोगों ने बैंक से लोन लेकर सहयोग किया था. यह घटना तिब्बती समुदाय की आस्था का अनूठा उदाहरण मानी जाती है. समय के साथ मठ का विस्तार होता गया. साल 1995 में इसे नए भवन में स्थानांतरित किया गया और बाद में यहां भिक्षुओं के रहने के लिए कक्ष भी बनाए गए. साल 2010 में मठ परिसर में एक भव्य स्तूप का निर्माण कराया गया, जिसे शांति का प्रतीक माना जाता है.
बताया जाता है कि इस स्तूप के निर्माण का उद्देश्य क्षेत्र में सुख-शांति और आपदाओं से रक्षा की कामना करना था. याशी थूपतेन बताते हैं कि, इस स्तूप में भगवान बुद्ध से जुड़े पांच पवित्र अवशेष स्थापित किए गए हैं. इसके साथ ही बौद्ध भिक्षुओं के जीवन से जुड़े अवशेष भी इसमें रखे गए, ताकि पवित्र ऊर्जा का संचार बना रहे. स्थानीय लोग मानते हैं कि यहां ध्यान और साधना करने से मानसिक शांति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है.
लोगों को होता है आत्मिक शांति का अनुभव
आज यह मॉनेस्ट्री नैनीताल के प्रमुख आकर्षणों में शामिल हो चुकी है. यहां सुबह-शाम प्रार्थना के दौरान घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार और हवा में लहराते प्रेयर फ्लैग्स वातावरण को आध्यात्मिक बना देते हैं. शहर की भीड़-भाड़ से दूर यह स्थान सैलानियों के लिए मेडिटेशन और आत्मिक शांति प्रदान करने वाली जगह बन चुकी है. स्थानीय लोगों के साथ-साथ बड़ी संख्या में पर्यटक भी यहां पहुंचते हैं. कई सैलानी यहां सिर्फ दर्शन ही नहीं, बल्कि कुछ देर बैठकर ध्यान करना पसंद करते हैं. लोगों का कहना है कि यहां की शांति और प्राकृतिक वातावरण मन को तुरंत सुकून दे देता है.
मठ तक पहुंचने का रास्ता
यहां तक पैदल ट्रैक करके यां फिर टैक्सी बाइक के जरिए पहुंच सकते हैं, आप अपनी गाड़ी से भी इस जगह तक पहुंच सकते हैं. यहां आने वाला रास्ता रिक्शा स्टैंड मल्लीताल और रैमसे रोड तल्लीताल से होकर जाता है. आप अपनी सुविधानुसार रास्ता चुन सकते हैं.
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सीमा नाथ पांच साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. शाह टाइम्स, उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम किया है. वर्तमान में मैं News18 (नेटवर्क18) के साथ जुड़ी हूं, जहां मै…और पढ़ें
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