ऐसे मिली प्रेरणा
सुजीत कुमार बताते हैं कि उन्हें मधुबनी पेंटिंग की प्रेरणा बिहार के मधुबनी, सीतामढ़ी और समस्तीपुर जैसे इलाकों में घूमने के दौरान मिली. वहां के कलाकारों को काम करते देखकर उनके मन में इस कला को सीखने की इच्छा जगी. शुरुआती दौर में उन्होंने खुद अभ्यास शुरू किया.
लगातार मेहनत, धैर्य और सीखने की चाह के कारण धीरे-धीरे वे एक कुशल मधुबनी पेंटिंग कलाकार बन गए. सुजीत का कहना है कि इस कला में कच्चे माल और समय की लागत जरूर आती है, लेकिन ऑर्डर भी लगातार मिलते रहते हैं. इसी के दम पर वे महीने में करीब 50 से 60 हजार रुपये तक की आमदनी कर लेते हैं.
रोज 8 घंटे देती हैं इस काम को
इस पूरी यात्रा में उनकी पत्नी श्वेता श्रीवास्तव की भूमिका बेहद अहम रही है. श्वेता बताती हैं कि उनके पति उन्हें अपना “दाहिना हाथ” कहते हैं, क्योंकि हर कदम पर वे एक-दूसरे का सहयोग करते हैं. पति-पत्नी दोनों ने मिलकर इस कला को व्यवसाय के रूप में आगे बढ़ाया है. श्वेता रोजाना करीब 8 घंटे मधुबनी पेंटिंग के काम को देती हैं और ऑर्डर के अनुसार अपने समय का प्रबंधन करती हैं.
तेजी से बढ़ रही मांग
श्वेता साड़ी, दुपट्टा, बेडशीट, शॉल, टी-शर्ट और कुर्ता जैसे कई तरह के कपड़ों पर मधुबनी पेंटिंग तैयार करती हैं. उनकी कलाकारी की खासियत पारंपरिक रंग, बारीक डिजाइन और शुद्ध हस्तकला है, जिसे लोग काफी पसंद कर रहे हैं. यही वजह है कि उनके बनाए उत्पादों की मांग बिहार से बाहर भी तेजी से बढ़ी है.
आज उनकी मधुबनी पेंटिंग लखनऊ, हैदराबाद, बनारस और दिल्ली जैसे बड़े शहरों तक पहुंच चुकी है. इतना ही नहीं, उनकी कला ने देश की सीमाएं भी पार की हैं और ऑस्ट्रेलिया जैसे विदेशों में भी सराहना पाई है.
कला को मिले सही मंच
सुजीत कुमार और श्वेता श्रीवास्तव का मानना है कि अगर लोक कला को सही मंच, मेहनत और निरंतरता मिले, तो यह सम्मान के साथ अच्छी आमदनी का जरिया बन सकती है. उनका जीवन इस बात का उदाहरण है कि पारंपरिक कला आज भी आधुनिक दौर में आत्मनिर्भरता की मजबूत नींव बन सकती है.
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