इस तकनीक के प्रयोग से लीची में फलों का झड़ना कम होता है और कुल उत्पादन में वृद्धि होती है. डॉ. मनेंद्र के अनुसार लीची के पेड़ों में गर्डलिंग का सही समय फूल आने से पहले अक्टूबर-नवंबर का महीना है. यह प्रक्रिया केवल 10 से 12 वर्ष या उससे अधिक आयु के वृक्षों में ही करनी चाहिए, जब पेड़ की छाल पर्याप्त मोटी और मजबूत हो जाती है.
डॉ. मनेंद्र कुमार ने बताया कि पारंपरिक मैनुअल गर्डलिंग प्रक्रिया न केवल कठिन और समयसाध्य होती है, बल्कि इसमें श्रम भी अधिक लगता है. हाथ से की जाने वाली गर्डलिंग में कट की गहराई नियंत्रित न होने के कारण कई बार पेड़ को नुकसान पहुंचने की आशंका बनी रहती है. इसके विपरीत यह मोटरचालित गर्डलिंग टूल शाखा पर समान और नियंत्रित गहराई में कट लगाता है, जिससे पौधे को न्यूनतम क्षति होती है और कार्य कम समय में पूरा हो जाता है. इसके प्रयोग से लीची के पेड़ों में फूल आने, फल की बेहतर सेटिंग और उत्पादन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है.
उन्होंने बताया कि गर्डलिंग एक महत्वपूर्ण बागवानी तकनीक है, जिसमें पेड़ की चुनी हुई शाखा पर चारों ओर 3 से 5 मिलीमीटर चौड़ी पतली छाल की पट्टी हटाई जाती है. इस दौरान इस बात का विशेष ध्यान रखा जाता है कि अंदर की लकड़ी को कोई नुकसान न पहुंचे. गर्डलिंग की प्रक्रिया से पत्तियों में बनने वाला कार्बोहाइड्रेट जड़ों की ओर न जाकर शाखाओं और फलों में अधिक मात्रा में जमा हो जाता है. इसका सीधा असर फलों की संख्या, आकार और मिठास पर पड़ता है.
इस तकनीक के प्रयोग से लीची में फलों का झड़ना कम होता है और कुल उत्पादन में वृद्धि होती है. डॉ. मनेंद्र के अनुसार लीची के पेड़ों में गर्डलिंग का सही समय फूल आने से पहले अक्टूबर-नवंबर का महीना है. यह प्रक्रिया केवल 10 से 12 वर्ष या उससे अधिक आयु के वृक्षों में ही करनी चाहिए, जब पेड़ की छाल पर्याप्त मोटी और मजबूत हो जाती है.
गौरतलब है कि लीची अनुसंधान और नवाचार के क्षेत्र में डॉ. मनेंद्र कुमार के योगदान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है. हाल ही में उनका नाम दुबई बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में “लीची मैन ऑफ इंडिया” के रूप में दर्ज किया गया है. उनके इस नवाचार से न केवल लीची उत्पादकों को आर्थिक लाभ मिलेगा, बल्कि मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध लीची को वैश्विक बाजार में नई और मजबूत पहचान भी मिलेगी.
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