मुख्यमंत्री आयुष्मान आरोग्य निशुल्क दवा योजना (मां) में बड़ी गड़बड़ी सामने आई है। गलत फीडिंग के कारण डॉक्यूमेंट मिस मैच होने से पीबीएम हॉस्पिटल के विभिन्न विभागों में 25 से 42 प्रतिशत तक क्लेम रिजेक्ट हो गए हैं। इसे लेकर पीबीएम अधीक्षक सहित छह विभागाध्यक्षों को नोटिस जारी किए गए हैं। इन विभागों में अब मरीजों के रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। दरअसल बीमा कंपनी ने प्रदेश के 28 जिलों में सरकारी अस्पतालों के क्लेम रिजेक्ट किए हैं, जिनमें से ज्यादा क्लेम बीकानेर के पीबीएम हॉस्पिटल के हैं। राज्य के चिकित्सा मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर जिले के प्रभारी मंत्री होने के बावजूद पीबीएम की परफॉर्मेंस पर सवाल खड़े होने लगे हैं। सरकारी हॉस्पिटल में मां योजना के तहत भर्ती होने वाले मरीजों के इलाज की राशि बीमा कंपनी देती है। इसके लिए भर्ती मरीजों की डिटेल और डॉक्यूमेंट बीमा कंपनी को भेजे जाते हैं। तमाम डॉक्यूमेंट और जरूरी जानकारी पोर्टल पर अपलोड होने के बाद बीमा कंपनी मरीज के इलाज में खर्च होने वाली राशि इलाज करने वाले सरकारी हॉस्पिटल के राजकीय खाते में ट्रांसफर करती है। कई मामलों में डॉक्यूमेंट और जानकारी अधूरी भेजने के कारण बीमा कंपनी ने क्लेम कर दिए। इसमें अधीक्षक से लेकर एचओडी, यूनिट हेड, नर्सिंग ऑफिसर और निचले कर्मचारियों की लापरवाही मानी जा रही है। चिकित्सा निदेशालय आयुक्त नरेश गोयल ने पीबीएम अधीक्षक सहित मेंटल हेल्थ, कैंसर, टीबी एंड चेस्ट, ईएनटी और बच्चा अस्पताल के एचओडी/ इंचार्ज को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। इसी तर्ज पर अधीक्षक ने भी उन्हीं एचओडी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। भास्कर इनसाइट- निरोगी में ज्यादा खर्च, 65 करोड़ की देनदारियां मां योजना में पैकेज कम लगने के साथ ही सबसे ज्यादा क्लेम रिजेक्ट होने ने पीबीएम प्रशासन की परफॉर्मेंस में कोढ़ में खाज का काम किया है। दरअसल 2025 में पीबीएम में मां योजना के तहत भर्ती हुए 49713 मरीजों को उपचार किया गया था, जबकि निरोगी राजस्थान के तहत 67605 मरीजों का इलाज किया गया। यानी 18 हजार से अधिक मरीजों के इलाज का खर्च पीबीएम को मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी से वहन करना पड़ा। इसका बड़ा कारण मां योजना के तहत डीएम अप्रूवल में विलंब माना जा रहा है। इसके अधिकांश केस कैंसर और हार्ट के मरीजों के हैं। इलाज महंगा होने के कारण परिजन सेम डे ई मित्र पर 850 रुपए जमा करवाकर रसीद कटवाते हैं। ऐसे मरीजों का इलाज मां योजना के तहत शुरू करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट की अप्रूवल 72 घंटे में मिलनी चाहिए, जो नहीं मिलती। नियमानुसार यह मरीज तीन महीने के बाद इलाज लेने के योग्य बनते हैं, लेकिन मरीज की जान बचाने के लिए डॉक्टर्स को इलाज शुरू करना पड़ा है। डीएम अप्रूवल के अभाव में प्रदेश के मरीजों को तो निरोगी राजस्थान योजना के तहत निशुल्क इलाज का फायदा मिलता है, लेकिन पीबीएम मेडिकेयर रिलीफ सोसायटी का खजाना खाली हो जाता है। यह खजाना मां योजना में ज्यादा से ज्यादा पैकेज बुक होने पर ही भरता है, जो नहीं हो पा रहा है। हालात ये है कि मरीजों के इलाज पर ठेकेदारों के सालों से जमा ईएमडी और एसडी के भी करोड़ों रुपए खर्च कर डाले। वर्तमान में सोसायटी पर करीब 65 करोड़ की देनदारी बताई जा रही है। भास्कर एनालिसिस : इन कारणों से रिजेक्ट हो रहे क्लेम किस विभाग के कितने प्रतिशत क्लेम रिजेक्ट हुए मेंटल हेल्थ इंस्टीट्यूट – 25 कैंसर रिसर्च सेंटर – 27.43 टीबी एंड चेस्ट – 27.50 ईएनटी – 30.31 पीबीएम मेडिसिन – 38.77 बच्चा हॉस्पिटल – 41.86 “मां योजना में हमारे काफी क्लेम रिजेक्ट हुए हैं। इसकी जांच करवाई जा रही है। संबंधित विभागों के एचओडी को नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है। पैकेज कम बुक होना चिंता का विषय है। डीएम अप्रूवल के लिए रोज आठ-दस केस भेज रहे हैं। निरोगी योजना में खर्च बढ़ रहा है।” – डॉ. बीसी घीया, अधीक्षक, पीबीएम हॉस्पिटल
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