झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथधाम में महाशिवरात्रि का पर्व बेहद खास होता है. यहां महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की चार प्रहर में शोडशोपचार विधि से विशेष पूजा की जाती है. यह पूजा विधि अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है,
महाशिवरात्रि का पावन पर्व 15 फरवरी को पूरे देश में श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा. इस दिन देश के सभी शिवालयों को भव्य रूप से सजाया जाता है. सुबह से ही मंदिरों में हर हर महादेव के जयकारे गूंजने लगते हैं. भक्त जल, दूध, भस्म, धतूरा और विशेष रूप से बेलपत्र अर्पित कर भगवान भोलेनाथ की पूजा-अर्चना करते हैं.
16 प्रकार के पूजन सामग्री से बाबा बैद्यनाथ की जाती है पूजा
देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक, झारखंड के देवघर स्थित बाबा बैद्यनाथधाम में महाशिवरात्रि का पर्व बेहद खास होता है. यहां महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव की चार प्रहर में शोडशोपचार विधि से विशेष पूजा की जाती है. यह पूजा विधि अत्यंत दुर्लभ मानी जाती है, जिसमें 16 प्रकार के पूजन सामग्री से बाबा बैद्यनाथ की आराधना होती है.इस दिन बाबा बैद्यनाथधाम में सबसे खास आकर्षण होता है बेलपत्र अर्पण. मंदिर के सभी तीर्थपुरोहित भगवान भोलेनाथ को अलग-अलग प्रकार के बेलपत्र अर्पित करते हैं.यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और इसकी अपनी विशेष मान्यता है.
क्या कहते है बैद्यनाथधाम के तीर्थंपुरोहित:
देवघर के प्रसिद्ध तीर्थ पुरोहित श्रीनाथ पंडित बताते हैं कि महाशिवरात्रि से कई दिन पहले ही तीर्थ पुरोहित दुर्लभ बेलपत्रों की खोज में निकल पड़ते हैं. वे त्रिकुट पर्वत, दिघरईया पहाड़ और बिहार के घने जंगलों से तीन पत्ता, पांच पत्ता और सात पत्ता वाले बेलपत्र तोड़कर लाते हैं. ये बेलपत्र सामान्य नहीं होते, बल्कि अत्यंत दुर्लभ माने जाते हैं.श्रीनाथ पंडित के अनुसार, इन विशेष बेलपत्रों को बाबा बैद्यनाथ पर अर्पित करने से भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं. मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से महाशिवरात्रि के दिन बाबा बैद्यनाथ का दर्शन कर बेलपत्र अर्पित करता है, उसके जीवन से कष्ट, रोग और बाधाएं दूर हो जाती हैं.
महाशिवरात्रि के अवसर पर बाबा बैद्यनाथधाम में लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से पहुंचते हैं. पूरी देवघर नगरी शिवमय हो जाती है. चारों ओर भक्ति, आस्था और विश्वास का अद्भुत संगम देखने को मिलता है.यही कारण है कि महाशिवरात्रि और बाबा बैद्यनाथधाम का यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह सनातन संस्कृति की गहरी जड़ों को भी दर्शाता है.
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