तिल और चावल का महत्व
मिथिलांचल में आज के दिन यानी की 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन एक विधि-व्यवहार आदिकाल से प्रचलित है,जो आज तक होता चला आया है. यह बड़ा ही अनोखा है. यहां का परंपरागत रिवाज है, जहां माताएं अपने बच्चों को या अपने से छोटे सभी सदस्य को तिल गुड़ और चावल खिलाकर उन्हें आजीवन सेवा करने का वचन दिलाती हैं.
दरअसल, आज के दिन स्नान ध्यान करने के बाद मां-दादी सबसे पहले खाने से पहले तिल गुड़ चावल अपने बच्चों को देती हैं और पूछती हैं मैथिली भाषा में कि (हमर तिल बहव) अर्थात् यह कि जब मैं बूढी हो जाऊं या जब मैं खुद सक्षम न रहूं तो आप हमारी सेवा करेंगे, हमारी रक्षा आपको ही करना है और जवाब में बच्चें भी 3 बार हां कहते हैं. यह मां के द्वारा बच्चों को वचन दिलाया जाता है और छोटे उसे स्वीकार करते हैं.
विशेष महत्व का है ये त्योहार
मकर संक्रांति के दिन हर जगह अलग-अलग तरह की रश्में होती हैं. कहीं पतंग उड़ाया जाता है, लेकिन मिथिला में शपथ लेना होता है. वैसे तो इसका कोई पौराणिक महत्व नहीं है, लेकिन ये परंपरागत होता चला आया है. हालांकि आज के दिन चूड़ा, दही, चीनी, गुड़, मिठाई और तिल का लाई, चुरा लाई भी खाया जाता है, लेकिन उससे पहले यह तिल-चावल और गुड वाला रस्म किया जाता है. साथ ही साथ इस दिन ब्राह्मण भोजन भी होता है जिसमें की खिचड़ी की मान्यता है.
मिथिलांचल में प्रसिद्ध खिचड़ी, घी, तरुआ, सब्जी और दही खिलाया जाता है. लोगों को निमंत्रण पर बुलाकर और उससे पहले उन्हें यह प्रश्न किया जाता है. हालांकि यह परंपरागत तौर पर होते आया है, जिसे आज भी यहां के लोग निभाते हैं और बहुत ही यह सुंदर दृश्य होता है. मां मात्र तीन बार यह कह देती हैं खाने के लिए और उसे आजीवन सेवा करने की उनकी रक्षा करने की उनसे शपथ लेती हैं. हालांकि वैसे भी माता-पिता की सेवा करना बच्चों का कर्तव्य है. पर वो इसे भूल ना जाएं, इसलिए हर वर्ष इस दिन मीठा खिलाकर याद दिलाया जाता है कि अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटना है.
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