Basor Artisans: हम बुजुर्ग हो गए हैं, बच्चे मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं. यहां बांस का काम करके दो‑पांच पैसा ही मिलता है. नई पीढ़ी इसे सीखना नहीं चाहती है. इसलिए भविष्य में बांस के सूप और टोकरी कम ही दिखेंगी.
कितनी कमाई होती है?
दिन भर मेहनत करने पर दो‑तीन सूप बनाते हैं और उससे केवल 200 रुपये ही कमाते हैं. हमारे आज की पीढी अब इसमें रुचि नही रखते. इसी तरह गोलन बसोर ने local 18 को बताया की एक झोपड़ी के नीचे बांस के उत्पाद तैयार करते हैं, हम बुजुर्ग हो गए हैं, बच्चे मजदूरी के लिए बाहर जाते हैं. यहां बांस का काम करके दो‑पांच पैसा ही मिलता है. नई पीढ़ी इसे सीखना नहीं चाहती, इसलिए भविष्य में बांस के सूप और टोकरी कम ही दिखेंगी. बासोर समुदाय के कारीगरों के अनुसार, परम्परागत शिल्प को निरंतर बनाए रखने में दो मुख्य अड़चनें हैं.
बाजार की घटती मांग और आर्थिक व्यावहारिकता का अभाव. आधुनिक रोजमर्रा की जरूरतों के कारण ग्राहक अब प्लास्टिक और सिंथेटिक सामग्रियों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे बांस के पारम्परिक उत्पादों की बिक्री में गिरावट आई है. सरकार ने बासोर कारीगरों के पुनरुत्थान हेतु कई योजनाएं शुरू की हैं. कारीगरों को आधुनिक उपकरण, कच्चा माल और बाजार संपर्क प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किए गए है. कौशल उन्नयन प्रशिक्षण शुरू किए गए है, डिजाइन‑आधारित कार्यशालाएं, जहां बासोर कारीगरों को बांस के उत्पादों में आधुनिक डिजाइन और टिकाऊ तकनीकें सिखाई जाती हैं.
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