चूल्हे पर न तेल था, न घी, लेकिन प्रसाद तैयार हो गया. इसे कुछ लोग चमत्कार कहते हैं, तो कुछ बाबा की सिद्धियों का परिणाम मानते हैं. बता दें, भारत में संतों की परंपरा केवल उपदेशों तक सीमित नहीं रही है. कई साधु-संतों के जीवन से जुड़े ऐसे किस्से हैं, जो आज भी लोगों की आस्था को मजबूती देते हैं. जय जय सियाराम बाबा भी उन्हीं संतों में से एक थे, जिनके जीवन का हर पल साधना, सेवा और त्याग से जुड़ा रहा. उनके आश्रम में आज भी यह मान्यता है कि यहां से कोई भी भूखा नहीं लौटता. हर दिन सैकड़ों परिक्रमावासी भी यहां भोजन करते हैं.
कौन थे जय-जय सियाराम बाबा?
जय जय सियाराम बाबा का वास्तविक नाम रामेश्वराचार्यजी महाराज था. वे बचपन से ही बाल ब्रह्मचारी थे. कम उम्र में ही उन्होंने अपना घर परिवार त्याग दिया. उनके जन्म स्थान और तिथि की ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन उनकी साधना यात्रा इंदौर से शुरू हुई. उन्होंने इंदौर के दास बगीची स्थित हनुमान मंदिर में कई वर्षों तक कठोर तप किया. माना जाता है कि यहीं उन्हें अनेक सिद्धियां प्राप्त हुईं.
इंदौर से महेश्वर और फिर अमरकंटक
महेश्वर स्थित श्री राम कुटी आश्रम के पंडित शिवम शर्मा बताते हैं, सन 1950 में बाबा इंदौर से नर्मदा तट पर स्थित महेश्वर आए. यहां उन्होंने लगभग 17 वर्षों तक साधना की और नर्मदा किनारे बालाजी हनुमान मंदिर को अपना साधना स्थल बनाया. इसी दौरान उन्होंने यहां आश्रम का निर्माण किया. शिवलिंग की भी स्थापना की. बाद में सन 1967 में वे नर्मदा उद्गम स्थल अमरकंटक चले गए. यहीं 22 अक्टूबर 1972, शरद पूर्णिमा के दिन लगभग 85 वर्ष की आयु में वे ब्रह्मलीन हो गए.
श्रीराम कुटी आश्रम और चरण कमल
उन्होंने बताया, महेश्वर स्थित श्री राम कुटी आश्रम बाबा की साधना का प्रमुख केंद्र रहा है. यहां से उनका गहरा लगाव रहा है. बाबा के पास ऐसी शक्तियां थी कि जो मांगो वह मिल जाता था. मान्यता है उनके देह त्यागने के बाद 28 मार्च 1974, गुरुवार, चैत्र सुदी पंचमी को बाबा के चरण कमल यहीं प्रकट हुए थे. इसके बाद से यह आश्रम आस्था का बड़ा केंद्र बन गया.
भंडारे, सेवा और नर्मदा परिक्रमा
बाबा ने महेश्वर में हनुमान जयंती, गंगा दशहरा, गुरु पूर्णिमा, शरद पूर्णिमा, आंवला नवमी और कार्तिक पूर्णिमा जैसे अवसरों पर भंडारों की परंपरा शुरू की. पंडित शिवम शर्मा बताते हैं कि बाबा के पास अनेक सिद्धियां थीं, लेकिन वे उनका उपयोग केवल सेवा के लिए करते थे, परंतु लोगों ने उनकी शक्तियों का गलत उपयोग किया. वे नाराज होकर अमरकंटक चले गए. लेकिन, बाबा के निधन के बाद भी महेश्वर में उनके शुरू किए भंडारे आज तक जारी हैं. पैदल नर्मदा परिक्रमा करने वाले यात्रियों को आश्रम में निःशुल्क भोजन और ठहरने की सुविधा दी जाती है.
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