आजकल विकास की बात हर जगह होती है, लेकिन क्या सिर्फ फैक्ट्रियां लगाना और पैसा कमाना ही विकास है. इसी सवाल का जवाब देता है ईएसजी शिक्षा. ईएसजी का मतलब होता है पर्यावरण की सुरक्षा, समाज की जिम्मेदारी और ईमानदार प्रशासन. यानी ऐसा विकास, जिसमें प्रकृति को नुकसान न पहुंचे, समाज का भला हो और व्यवस्था बिल्कुल साफ रहे. छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (CSJMU) की शोधार्थी सोनाली निगम ने अपने शोध में साफ तौर पर बताया है कि आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए ईएसजी शिक्षा बेहद जरूरी है. उनका कहना है कि बिना ईएसजी सोच के किया गया विकास ज्यादा समय तक टिक नहीं पाता.
ईएसजी शिक्षा क्या है और आम आदमी से क्या मतलब
ईएसजी शिक्षा का सीधा मतलब है लोगों को यह समझाना कि विकास सिर्फ मुनाफे के लिए नहीं होना चाहिए. इसमें यह सिखाया जाता है कि उद्योग, संस्थाएं और सरकारें पर्यावरण का ख्याल रखें, समाज के हर वर्ग को साथ लेकर चलें और फैसलों में ईमानदारी रखें. शोधार्थी सोनाली निगम के मुताबिक, अगर छात्रों को शुरू से ही ईएसजी की शिक्षा दी जाए, तो वे आगे चलकर बेहतर फैसले ले पाएंगे. इससे न केवल कंपनियां जिम्मेदार बनेंगी, बल्कि आम लोगों को भी रोजगार, साफ वातावरण और बेहतर जीवन मिलेगा.
शोध में सामने आया ईएसजी का आर्थिक फायदा
अपने शोध में सोनाली निगम ने बताया कि ईएसजी आधारित मॉडल अपनाने से देश की अर्थव्यवस्था को सीधा फायदा होता है. जब कंपनियां पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचातीं और समाज के लिए काम करती हैं, तो निवेशकों का भरोसा बढ़ता है. इससे रोजगार के नए मौके बनते हैं, प्रदूषण कम होता है और सामाजिक असमानता भी घटती है. शोध में यह भी कहा गया है कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए ईएसजी मॉडल बहुत कारगर साबित हो सकता है. इससे विकास लंबे समय तक टिकाऊ बना रहता है.
नीति और पढ़ाई में ईएसजी को जगह देने की जरूरत
शोध में यह सुझाव दिया गया है कि सरकार और शिक्षा संस्थानों को ईएसजी शिक्षा को गंभीरता से अपनाना चाहिए. अगर इसे नीति निर्माण और पढ़ाई का हिस्सा बनाया जाए, तो आने वाले समय में बेहतर और जिम्मेदार नागरिक तैयार होंगे.सोनाली निगम का कहना है कि उनका शोध वर्तमान दौर की जरूरतों को देखते हुए किया गया है. अगर ईएसजी सोच को सही तरीके से लागू किया जाए, तो भारत आर्थिक रूप से मजबूत होने के साथ-साथ पर्यावरण और समाज के स्तर पर भी आगे बढ़ेगा.
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