Jodhpur Choutia Joshi Family Holi Mourning History: जोधपुर के चोवटिया जोशी परिवार में 400 साल पुरानी एक दुर्घटना के कारण होली नहीं मनाई जाती है. विक्रम संवत 1752 में माड़वा गांव में होलिका दहन के दौरान एक मां और उसका मासूम बेटा अग्नि में गिर गए थे, जिससे उनकी मृत्यु हो गई थी. तब से यह परिवार होलाष्टक से धुलंडी तक शोक मनाता है. न घर में पकवान बनते हैं और न ही ये लोग होलिका दहन देखते हैं.
इस परंपरा के पीछे एक अत्यंत हृदयविदारक ऐतिहासिक घटना छिपी है. पोकरण से 22 किमी दूर बाड़मेर रोड पर स्थित माड़वा गांव में 400 वर्ष पूर्व चोवटिया जोशियों के कई परिवार रहा करते थे. विक्रम संवत 1752 के फाल्गुन मास की पूर्णिमा को जब पूरा गांव हर्षोल्लास के साथ होली मना रहा था, तभी एक भीषण दुर्घटना घटी. हरखाजी जोशी की पत्नी लाला देवी अपने सबसे छोटे पुत्र भागचंद्र को गोद में लेकर होलिका दहन स्थल की पूजा के बाद परिक्रमा कर रही थीं. उसी समय किलकारियां मारता मासूम बालक अचानक मां की गोद से छिटक कर जलती हुई होली की भीषण अग्नि में गिर गया. अपने कलेजे के टुकड़े को बचाने के लिए मां लाला देवी भी बिना सोचे-समझे आग की लपटों में कूद गईं. जब तक ग्रामीण कुछ समझ पाते, मां और बेटे दोनों अग्नि में समा चुके थे. इस घटना ने पूरे गांव को हिलाकर रख दिया और होली की खुशियां मातम में बदल गईं.
होलाष्टक से धुलंडी तक शोक के कड़े नियम
उस कालजयी दुर्घटना के बाद से ही समस्त चोवटिया जोशी परिवारों ने अपने और अपने आने वाले वंशजों के लिए होली को उत्सव के बजाय शोक का पर्व मान लिया. इस खांप में ‘होलाष्टक’ लगने से लेकर ‘धुलंडी’ तक शोक रखा जाता है. इन आठ दिनों के दौरान परिवार में कोई भी नया सामान नहीं खरीदा जाता और न ही नए कपड़े सिलाए या पहने जाते हैं. घर में किसी भी प्रकार का मिष्ठान या पकवान बनाना वर्जित है. यहां तक कि बच्चों की ‘ढूंढ’ पूजने की रस्म भी नहीं निभाई जाती है. परिवार के लोग होली की झाळ या लपटें तक नहीं देखते हैं. परंपरा इतनी कड़ी है कि उस समय घरों में बने पकवान पशुओं को डाल दिए गए थे और अगले दो दिनों तक किसी भी घर में चूल्हा तक नहीं जला था. आज भी यह परिवार इस दुखद घटना की स्मृति में पूर्ण सादगी और शोक का पालन करता है.
देश-विदेश में आज भी कायम है परंपरा
समय बदलने के साथ चोवटिया जोशी परिवार के लोग जोधपुर, पोकरण से निकलकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बस गए हैं, लेकिन अपनी जड़ों और इस मान्यता को उन्होंने आज भी जीवित रखा है. मनोरंजन के कार्यक्रम, पकवान और रंगों से दूरी बनाकर वे अपने उन पूर्वजों को श्रद्धांजलि देते हैं जिन्होंने अग्नि की भेंट चढ़कर अपने प्राण गवां दिए थे. यह परंपरा दर्शाती है कि समाज में किस तरह ऐतिहासिक घटनाएं सदियों तक संस्कारों और रीति-रिवाजों का हिस्सा बनी रहती हैं. चोवटिया जोशी परिवारों के लिए होली रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि एक मां और पुत्र के बलिदान और उस दुखद दुर्घटना की याद दिलाने वाला एक गंभीर समय है.
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Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a seasoned multimedia journalist and digital content specialist with 8 years of experience across digital media, social media management, video production, editing, content…और पढ़ें
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