कोडरमा जिले के जयनगर प्रखंड अंतर्गत चेहाल पंचायत का डुमरी गांव आजादी के 75 साल बाद भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है। लगभग 800 की आबादी वाले इस गांव तक पहुंचने के लिए आज तक कोई पक्की सड़क नहीं बन पाई है।
ग्रामीणों का कहना है कि तीन पीढ़ियां गुजर गईं, लेकिन गांव में पक्की सड़क का निर्माण नहीं हुआ। सड़क के अभाव में अब गांव के युवकों की तय शादियां तक टूट रही हैं, जिससे ग्रामीण गंभीर सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।
हाल ही में गांव के एक युवक का रिश्ता तय हुआ था। शादी की बातचीत और अन्य रस्में पूरी हो चुकी थीं, लेकिन जब वधू पक्ष के लोग डुमरी गांव पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि गांव तक मोटरसाइकिल से भी पहुंचने का कोई रास्ता नहीं है।
इसके बाद लड़की पक्ष ने अपनी बेटी की शादी डुमरी गांव में करने से इनकार कर दिया और रिश्ता टूट गया। ग्रामीणों के अनुसार, यह पहली घटना नहीं है; इससे पहले भी सड़क न होने के कारण कई रिश्ते टूट चुके हैं। अब आसपास के गांवों में यह धारणा बन गई है कि डुमरी गांव में बेटी देना मतलब उसे मुश्किल भरी जिंदगी सौंप देना है।
3 किलोमीटर तक पक्की सड़क, इसके बाद कच्चा रास्ता
डुमरी गांव प्रखंड मुख्यालय से महज 5 किलोमीटर दूर स्थित है, लेकिन यहां तक पहुंचना बेहद कठिन है। प्रखंड मुख्यालय से लगभग 3 किलोमीटर तक पक्की सड़क है, जिसके बाद रेलवे की जमीन शुरू हो जाती है।
रेलवे विभाग ने कॉरिडोर परियोजना के तहत पूरे क्षेत्र में घेराबंदी कर दी है, जिससे गांव तक सड़क निर्माण पूरी तरह बाधित हो गया है। लगभग 1 किलोमीटर का इलाका रेलवे भूमि में पड़ने के कारण गांव का बाहरी दुनिया से संपर्क लगभग कट गया है।
बड़े वाहनों का गांव तक पहुंचना पूरी तरह असंभव
मजबूरी में ग्रामीण रेलवे की घेराबंदी का एक पिलर हटाकर आवागमन करते हैं। हालांकि, इससे ग्रामीणों में बड़ी दुर्घटना का भय बना रहता है और उनकी सुरक्षा पर लगातार खतरा मंडराता रहता है। इधर, बड़े वाहनों का गांव तक पहुंचना पूरी तरह असंभव है, जिसके चलते ग्रामीणों को अपने वाहन दूसरे गांवों में छोड़ने पड़ते हैं।
गांव में कुल 104 घर हैं और करीब 500 मतदाता रहते हैं। चुनाव के समय नेताओं द्वारा आश्वासन तो दिए जाते हैं, लेकिन बाद में समस्याएं जस की तस बनी रहती हैं। गांव के अधिकतर लोग खेती-किसानी पर निर्भर हैं, लेकिन सड़क नहीं होने से न तो कृषि संसाधन आसानी से मिल पाते हैं और न ही उपज को बाजार तक पहुंचाया जा सकता है।
गांव के उत्तर में अक्तो नदी, पूर्व में लगभग एक किलोमीटर की दूरी पर सरमाटांड रेलवे स्टेशन और पश्चिम में ककरचोली गांव है। चारों ओर से घिरा यह गांव धीरे-धीरे एक बंद द्वीप जैसा बनता जा रहा है।
बीमार मरीजों को अस्पताल ले जाना सबसे बड़ी चुनौती
ग्रामीण कृष्णा यादव, सूर्यनारायण यादव और अनवर बताते हैं कि सड़क के अभाव में हर दिन डर और अनिश्चितता के साथ गुजरता है। बीमार मरीजों को अस्पताल ले जाना सबसे बड़ी चुनौती है। बरसात के दिनों में पगडंडियां भी चलने लायक नहीं रहतीं।
बच्चों की शिक्षा भी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। गांव में एक भी विद्यालय नहीं है। सर्व शिक्षा अभियान के तहत चल रहा नव प्राथमिक विद्यालय वर्ष 2017 में मर्ज कर दूसरे गांव में स्थानांतरित कर दिया गया, जिसके बाद कई बच्चे पढ़ाई से भी वंचित हो गए हैं।
इधर, इस पूरे मामले पर प्रखण्ड विकास पदाधिकारी गौतम कुमार ने कहा कि यह मामला उनके संज्ञान में है। उन्होंने कहा कि यह गांव घनी आबादी वाला है, और वहां आने-जाने का रास्ता नहीं हो पाना एक समस्या है। चूंकि उक्त गांव जाने के लिए एकमात्र रेलमार्ग पार कर ही जाना संभव है।
इसलिए इसमें रेलवे से ही किसी वैकल्पिक रास्ते की बात की जाएगी। उन्होंने कहा कि इस समस्या को जिले के उपायुक्त के समक्ष रख दिया है। उपायुक्त द्वारा रेलवे से इस संबंध में बात भी हुई है। उपायुक्त, सांसद और रेलवे की पहल से जल्द ही कोई विकल्प निकाला जाएगा और डुमरी गांव के लोगों के लिए आवागमन के लिए अंडरपास के माध्यम से नई राह तैयार की जाएगी।
इस संबंध में जिला परिषद उपाध्यक्ष निर्मला देवी ने कहा कि गांव में सड़क नहीं होने की समस्या को दिशा की बैठक में सांसद, विधायक और उपायुक्त के समक्ष उठाया जाएगा। उन्होंने भरोसा दिलाया कि शीघ्र ही डुमरी गांव तक सड़क निर्माण का प्रयास किया जाएगा, ताकि ग्रामीणों को इस कैद जैसी जिंदगी से मुक्ति मिल सके।
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