घोटा गैर की सबसे बड़ी विशेषता है ‘बाबैया ढोल’। स्थानीय जाकोब तालाब क्षेत्र में रहने वाले मीर समाज के लोग पिछले करीब 62 वर्षों से इस ढोल को बजा रहे हैं। मान्यता है कि सैकड़ों वर्ष पुराने इस ढोल को ठाकुरों द्वारा मीर समाज को सौंपा गया था। यह ढोल वर्ष में केवल होली पर ही बाहर निकाला जाता है। इसकी ध्वनि इतनी विशिष्ट और प्रभावशाली होती है कि लोग स्वतः ही नृत्य के लिए आकर्षित हो जाते हैं। पहले इसकी आवाज कई किलोमीटर दूर तक सुनाई देती थी।
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घोटा गैर में बड़ी संख्या में युवा और बुजुर्ग हाथों में लठ लेकर ढोल की थाप पर जोश और उमंग के साथ नृत्य करते हैं। दिनभर विभिन्न समाजों और गणमान्य लोगों के यहां ढोल ले जाकर ‘करबा पीने’ की रस्म भी निभाई जाती है। शाम तक गैर शहर के प्रमुख चौहटों से होती हुई घंटाघर पहुंचती है और उसके चारों ओर चक्कर लगाए जाते हैं।
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