खेलकूद, आउटडोर गतिविधियों की जगह मोबाइल पर गेम्स, रील, एनिमेटिड मूवी देखने के साथ ऑनलाइन पढ़ाई करने की आदत नौनिहालों की नजर को कमजोर कर रही है। अस्पतालों में अब स्कूल जाने की उम्र शुरू होने से पहले ही बच्चे नजर कमजोर होने की समस्या को लेकर उपचार के लिए आने लगे हैं। यह सब मोबाइल, लेपटॉप जैसे गेजेट के अधिक उपयोग का नतीजा है। विशेषज्ञों के अनुसार स्कूल जाने से पहले बच्चों की आंखें चेेक करवाना जरूरी है। इसी से पता लग सकता है कि अधिक मोबाइल उपयोग करने से कहीं आंखें कमजोर तक नहीं हुई हैं।
टेस्ट में आंखें कमजोर पाए जाने पर समय से नंबर के चश्मे लगाने पर बच्चे की आंखें ठीक होने की संभावना होती है। चश्मा हट भी सकता है, चूंकि बच्चे की गढ़ती उम्र और ग्रोथ के साथ आंखों की क्षमता और नजर भी अच्छी हो सकती है। दीनदयाल उपाध्याय अस्पताल शिमला की ओपीडी में रोजाना औसतन तीन से चार, आईजीएमसी की ओपीडी में पांच से सात छोटी उम्र के बच्चे आंखें चेक करवाने के लिए आने लगे हैं। यह आंकड़े पहले से अधिक हैं।
आंखों की सुरक्षा के लिए बच्चों के स्क्रीन टाइम को कम करवाना अभिभावकों के लिए भी मुश्किल होने लगा है। इन गेटेजेट्स पर बढ़ती निर्भरता, ऑनलाइन क्लास, बच्चों का मोबाइल से ही मनोरंजन करना आंखों के लिए बड़ा खतरा बनने लगा है। बच्चों के खान-पान में आया बदलाव, हरी सब्जियों का कम सेवन, जंक फूड का अधिक उपयोग भी आंखों को कमजोर कर रहा है। आउटडोर गतिविधियां न कर मोबाइल, लैपटॉप का स्क्रीन टाइम बढ़ने, खेलकूद में भाग न लेने से बच्चों की आंखों पर सीधा असर पड़ रहा है।