पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट इंश्योरेंस कंपनी के खिलाफ सुनाया फैसला।
एक सड़क हादसे में हैवी वाहन चालक की मौत के बाद उसके परिजनों को दिए गए मुआवजे को लेकर दायर अपील पर सुनवाई करते हुए पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल (MACT) के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार कर दिया।
यह मामला एक सड़क हादसे में मौत के बाद दिए गए मुआवजे से जुड़ा है। MACT ने 10 जुलाई 2017 को मृतक के परिजनों को 19.60 लाख रुपए मुआवजा और 7.5 प्रतिशत सालाना ब्याज देने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ बीमा कंपनी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। याचिका हाईकोर्ट में विमल कौर ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के खिलाफ दायर की थी।
ट्रिब्यूनल ने मृतक की आमदनी ज्यादा मानी
बीमा कंपनी का कहना था कि ट्रिब्यूनल ने मृतक की आमदनी ज्यादा मान ली है। कंपनी ने दलील दी कि मृतक की मासिक आय 15,680 रुपए तय करने में कुरुक्षेत्र के डिप्टी कमिश्नर की ओर से जारी मजदूरी दर को आधार बनाया गया, जबकि पूरे हरियाणा राज्य के लिए तय न्यूनतम मजदूरी दर इससे कम है। इसलिए मुआवजा घटाया जाना चाहिए। वहीं, मृतक के परिवार की ओर से कहा गया कि मुआवजा कम है और इसे बढ़ाने के लिए अलग से अपील दायर की गई है।
जज बोले- भारी वाहन चलाने का था अनुभव
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने कहा कि रिकॉर्ड में मृतक का ड्राइविंग लाइसेंस मौजूद है। ड्राइविंग लाइसेंस से साफ है कि मृतक को हैवी और मीडियम माल ढोने वाले वाहन चलाने की अनुमति थी। इसका मतलब है कि वह ऐसा ड्राइवर था जिसे भारी वाहन चलाने का पूरा अनुभव और योग्यता थी।
कोर्ट ने कहा कि ट्रिब्यूनल ने मृतक की आय तय करने में कोई गलती नहीं की। रिकॉर्ड में ऐसा कोई सबूत नहीं है, जिससे यह साबित हो कि कुरुक्षेत्र में लागू मजदूरी दरें मृतक पर लागू नहीं होती थीं।
हाईकोर्ट ने कहा कि ऊपरी अदालत तभी दखल देती है, जब निचली अदालत का फैसला साफ तौर पर गलत, कानून के खिलाफ या बिना वजह लिया गया हो। केवल यह सोचकर कि मामला किसी और तरह से भी देखा जा सकता है, फैसले में बदलाव नहीं किया जा सकता।
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