झुंझुनूं: कोट गांव में लहलहा रहे चंदन के 500 पेड़, 5 साल में 15 फीट ऊंचे हुए
झुंझुनूं | अरावली की वादियों में चंदन के पेड़ लगाना किसी कल्पना से कम नहीं है। क्योंकि अरावली पर्वतमाला मुख्य रूप से पथरीली और शुष्क पहाड़ियों के लिए जानी जाती है, जबकि चंदन के पेड़ गर्म व आर्द्र जलवायु क्षेत्र में उगते हैं। इसके बावजूद कोट गांव में एलआईसी से सेवानिवृत्त विकास अधिकारी महेश कुमार पारिक ने चंदन की खेती कर इसे संभव कर दिखाया है।
उन्होंने 5 साल पहले दो हेक्टेयर भूमि में 500 पौधे लगाए थे, जो अब 15 फीट के पेड़ बनकर लहलहा रहे हैं। उनकी मेहनत के कारण चंदन के पौधे पांच साल में करीब 15 फीट ऊंचे हो गए हैं। पहली बार 2019 में भी चंदन के पौधे लगाए गए थे।
अजमेर: सर्दियों में कर रहे ऑफ-सीजन सब्जियों की खेती
सर्दी में उत्तर प्रदेश के किसान अजमेर हाइवे से सटे खेतों को किराए पर लेकर आधुनिक तकनीक से लौकी, खीरा, खरबूजा, तरबूज और करेले की खेती कर रहे हैं। फसलों को ठंड, धूल-मिट्टी और कीट-पतंगों से बचाने के लिए पॉलीथिन शीट से ढककर पाइपनुमा लो-टनल (क्यारियां) बनाई गई हैं। इन टनलों में ड्रिप इरिगेशन सिस्टम से पानी और पोषक तत्वों की सप्लाई की जा रही है। इस तकनीक से मात्र 3 माह में फसल तैयार हो जाती है। किसान सद्दाम हुसैन बताते हैं कि पॉलीथिन कवर से तापमान नियंत्रित रहता है। सर्दी में भी गर्मी वाली सब्जियां उगाई जा सकती हैं।
उदयपुर: स्ट्रॉबेरी की खेती, सवा लाख पौधों से एक करोड़ कमाई की आस
उदयपुर | मावली के नारायण सिंह राव ने उदयपुर-राजसमंद बॉर्डर पर पिछले साल स्ट्रॉबेरी की खेती की थी। चार महीने में 6 लाख रुपए की कमाई की थी। इस बार नारायण सिंह ने रकबा बढ़ाकर सवा लाख पौधे लगाए हैं। इनसे करीब सवा करोड़ रुपए की बिक्री होगी। खर्च 26 लाख रुपए निकालने के बाद करीब एक करोड़ कमाई की आस है।
अक्टूबर में बुवाई के बाद तीन महीने तक स्ट्रॉबेरी के फल आते हैं। पिछले साल डॉ. महेश दवे के 5 बीघा में खेती की थी। इस बार 12 बीघा में स्ट्रॉबेरी बोई है। डॉ. महेश दवे का खेत राजसमंद सीमा में आता है, वहीं शेष 7 बीघा उदयपुर की ईसवाल पंचायत में आता है।
बाड़मेर: नेपियर घास से रोज बनेगी 6.50 टन बायो-सीएनजी
बाड़मेर | बायो-सीएनजी गैस उत्पादन के लिए नेपियर घास पर आधारित प्रदेश का पहला ऐसा बायो-सीएनजी प्लांट बाड़मेर जिले में लग रहा है। यह रोज 6.50 टन उत्पादन करेगा। बायो-सीएनजी निकलने के बाद लिक्विड और सूखा जो वेस्ट निकलेगा, वह फसलों के लिए सर्वोत्तम गुणवत्ता वाली जैविक खाद के रूप में काम आएगा। सांचौर की एक निजी कंपनी द्वारा चौहटन क्षेत्र के कोनरा व ईटादा के बीच बायो-सीएनजी का प्लांट विकसित किया जा रहा है।
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