Nihal Tower Dholpur History: धौलपुर का निहाल टावर भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर है. इसका निर्माण महाराजा निहाल सिंह और उदयभान सिंह के समय हुआ था. यह 150 फीट ऊंचा है और लाल-सफेद बलुआ पत्थर से बना है.
राजस्थान अपनी स्थापत्य कला की भव्यता के लिए विश्व विख्यात है. जब भी यहाँ की बेजोड़ शिल्पकला का ज़िक्र होता है, तो चित्तौड़गढ़ का विजय स्तंभ सबसे पहले मानस पटल पर उभरता है, जिसे ‘राजस्थान का गौरव’ कहा जाता है. ठीक इसी गौरवमयी परंपरा की एक और मिसाल धौलपुर जिले में भी देखने को मिलती है. धौलपुर में स्थित निहाल टावर, जो कि एक विशाल घंटाघर है, राजस्थान की वास्तुकला का एक अनूठा उदाहरण है. लगभग 150 फीट की ऊंचाई वाला यह स्तंभ भारत का सबसे ऊंचा घंटाघर माना जाता है. जहाँ चित्तौड़गढ़ का स्तंभ विजय की गाथा कहता है, वहीं धौलपुर का यह घंटाघर अपने समय की आधुनिक इंजीनियरिंग और राजसी वैभव का प्रतीक है.

धौलपुर का यह भव्य स्तंभ इतिहास के पन्नों में निहाल टावर के नाम से दर्ज है. रियासत काल के दौरान इस विशाल स्तंभ का मुख्य उपयोग एक ‘समय सूचक यंत्र’ यानी घंटाघर के रूप में किया जाता था, ताकि पूरे शहर को समय की जानकारी मिल सके. अपनी भव्यता और कलात्मक नक्काशी के लिए प्रसिद्ध इस टावर का निर्माण कार्य धौलपुर रियासत के महाराजा निहाल सिंह के शासनकाल में शुरू हुआ था. हालांकि, उनके समय में यह पूरा नहीं हो सका और इसके निर्माण को पूर्ण करवाने का श्रेय महाराजा उदयभान सिंह को जाता है, जिन्होंने इसे वर्तमान स्वरूप प्रदान किया.

धौलपुर की इस ऐतिहासिक धरोहर को देखने मात्र से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह भारतीय स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है. इतिहासकार अरविंद कुमार शर्मा के अनुसार, यह इमारत धौलपुर के प्रसिद्ध लाल पत्थर (Red Stone) की सबसे अद्भुत ‘ब्रांड एंबेसडर’ है. उनकी दृष्टि में इसे लाल पत्थर से निर्मित भारत की सर्वश्रेष्ठ इमारतों में से एक माना जा सकता है. निहाल टावर की बनावट और इसकी कलात्मकता इतनी प्रभावशाली है कि जब भी किसी की दृष्टि इस पर पड़ती है, तो वह इसकी सुंदरता में खो जाता है. इसकी भव्यता ऐसी है कि इसे बार-बार देखने का मन करता है, जो इसे स्थापत्य कला की दुनिया में बेहद अनूठा और आकर्षक बनाता है.
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धौलपुर के गौरव पथ पर गर्व से खड़ा यह निहाल टावर केवल एक ऐतिहासिक इमारत ही नहीं, बल्कि राजस्थान के स्वाधीनता संग्राम के गौरवशाली इतिहास का साक्षी भी है. वर्ष 1946 में इसी टावर की छाया में धौलपुर के वीर क्रांतिकारियों ने ‘जय हिंद संघ’ की स्थापना की थी. वह पल अत्यंत भावुक और प्रेरणादायक था, जब क्रांतिकारियों ने अपने शरीर से रक्त निकालकर कागजों पर हस्ताक्षर किए और यह प्रतिज्ञा ली कि वे अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अंतिम सांस तक लड़ेंगे. स्वतंत्रता सेनानियों के उस बलिदान और संघर्ष को निहाल टावर ने बहुत करीब से देखा है. इसीलिए, यह भव्य स्तंभ न केवल अपनी वास्तुकला के लिए जाना जाता है, बल्कि यह धौलपुर के स्वाधीनता आंदोलन की अमर गाथा का एक महत्वपूर्ण अध्याय भी है.

स्थानीय लोगों की यादों में आज भी निहाल टावर की वह गूँज बसी हुई है, जब इसकी घड़ी पूरी तरह क्रियाशील थी और इसके घंटे की आवाज़ दूर-दराज के इलाकों तक सुनाई देती थी. इस ऐतिहासिक स्तंभ की छठी मंजिल पर चारों दिशाओं में घड़ियाँ स्थापित की गई हैं, ताकि शहर के हर कोने से समय देखा जा सके. धौलपुर के प्रसिद्ध लाल पत्थर से निर्मित यह आठ मंजिला संरचना अपनी विशिष्ट ऊंचाई और बनावट के कारण पूरे देश में प्रथम स्थान रखती है. उल्लेखनीय है कि इस टावर में लगी विशेष घड़ी का निर्माण इंग्लैंड की विख्यात कंपनी ‘मैसर्स जिलेट जॉनसन क्रॉयडन’ द्वारा किया गया था, जो उस दौर की उन्नत तकनीक और राजसी वैभव का एक जीवंत प्रमाण है.
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