डेंगू को अक्सर बुखार तक सीमित बीमारी माना जाता है। सावधान रहिए…बच्चों के लिए यह जानलेवा साबित हो सकता है।
पीजीआई के एडवांस पीडियाट्रिक सेंटर की शोध में खुलासा हुआ है कि डेंगू बच्चों के दिमाग पर गंभीर हमला कर सकता है। इससे अचानक बेहोशी, दौरे और जान को खतरा पैदा हो जाता है। रिसर्च में स्पष्ट किया गया है कि समय पर इलाज न मिलने पर बच्चों में एक्यूट नेक्रोटाइजिंग एन्सेफैलोपैथी जैसी खतरनाक बीमारी हो सकती है।
डॉक्टरों ने अभिभावकों को चेताया है कि अगर डेंगू या तेज बुखार के दौरान बच्चे को झटके आएं, उल्टी हो, ज्यादा नींद आए या वह बातों का जवाब न दे तो इसे नजरअंदाज न करें। पीजीआई में 11 साल तक चली स्टडी में बच्चों के इलाज, आईसीयू जरूरत और बीमारी के नतीजों का विश्लेषण किया गया। इसमें सामने आया कि समय पर सतर्कता और इलाज से कई बच्चों की जान बचाई जा सकती है। यह शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी में प्रकाशित किया गया है।
21.9 प्रतिशत मामलों में डेंगू वायरस एएनईसी का ट्रिगर बना
शोध को करने वाले डॉ. सुरेश कुमार अनगूराना ने बताया कि पीडियाट्रिक इमरजेंसी और पीडियाट्रिक आईसीयू में 11 वर्षों (2014 से 2024) के दौरान किए गए इस रेट्रोस्पेक्टिव अध्ययन में साफ हुआ है कि डेंगू वायरस इस जानलेवा बीमारी का सबसे बड़ा कारण बनकर उभरा है। शोध में यह भी सामने आया कि 21.9 प्रतिशत मामलों में डेंगू वायरस एएनईसी का ट्रिगर बना जबकि एच1एन1 इन्फ्लुएंजा, कोविड-19, ह्यूमन मेटाप्न्यूमोवायरस और स्क्रब टाइफस जैसे संक्रमण भी कुछ मामलों में जिम्मेदार पाए गए। वायरल संक्रमण के बाद शरीर में उत्पन्न साइटोकाइन स्टॉर्म दिमाग को गंभीर नुकसान पहुंचाता है जिससे यह बीमारी तेजी से जानलेवा रूप ले लेती है।
इलाज में सफलता
56% बच्चों को इलाज के दौरान वेंटिलेटर सपोर्ट की आवश्यकता पड़ी
31% बच्चों को वेसोएक्टिव दवाएं देनी पड़ीं
कई बच्चों में किडनी, लिवर और अन्य अंगों पर भी गंभीर असर देखा गया
समय पर गहन चिकित्सा और इम्यूनोथैरेपी के कारण 78% बच्चों की जान बचाने में सफलता मिली
डॉक्टरों ने इलाज में स्टेरॉयड, इंट्रावीनस इम्युनोग्लोब्युलिन (आईवीआईजी) और टोसिलिज़ुमैब जैसी इम्यूनोमॉड्यूलेटरी थेरेपी का इस्तेमाल किया
चिंताजनक पहलू
इसका चिंताजनक पहलू यह है कि जीवित बचे अधिकतर बच्चों को अस्पताल से छुट्टी के समय मध्यम से गंभीर न्यूरोलॉजिकल विकलांगता रही। बाल चिकित्सा सेरेब्रल प्रदर्शन श्रेणी स्कोर के अनुसार बच्चों की मानसिक और शारीरिक क्षमताओं पर लंबे समय तक असर पड़ने की आशंका जताई गई है। शोध में यह भी स्पष्ट किया गया कि ये स्कोर जितना अधिक रहा, मृत्यु का खतरा उतना ही ज्यादा पाया गया। सभी मृत बच्चों में यह स्कोर हाई-रिस्क श्रेणी में था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस स्कोर के आधार पर शुरुआती चरण में ही मरीजों की गंभीरता का आकलन कर इलाज की रणनीति तय की जा सकती है।
डेंगू जैसे आम समझे जाने वाले वायरल संक्रमण भी बच्चों में जानलेवा न्यूरोलॉजिकल जटिलताएं पैदा कर सकते हैं। समय पर पहचान, त्वरित रेफरल, आईसीयू सुविधा और इम्यूनोमॉड्यूलेटरी इलाज बच्चों की जान बचाने के लिए बेहद जरूरी है। – डॉ. सुरेश कुमार अनगूराना
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