राजधानी के नरेला इलाके में इतिहास और पर्यावरण से जुड़ा एक अहम अध्याय फिर चर्चा में है। सेक्टर ए-10 में स्थित सदियों पुराना जलकुंड, जिसे राजा चंद के समय का बताया जाता है, लगभग 84 बीघा क्षेत्र में फैला है। लंबे समय से उपेक्षा, गंदगी और कथित अतिक्रमण का शिकार रहे इस जलकुंड को बचाने की लड़ाई अब राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) तक पहुंच गई है। स्थानीय निवासी राम चंदर भारद्वाज द्वारा दायर याचिका के बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) हरकत में आया है। डीडीए ने एनजीटी को हलफनामा देकर न सिर्फ सफाई और सर्वे शुरू करने की जानकारी दी है, बल्कि इसे नमभूमि घोषित कराने की दिशा में कदम उठाने का दावा भी किया है। यह मामला राजधानी में जलस्रोतों के संरक्षण की गंभीर तस्वीर पेश करता है।
एनजीटी में दाखिल हलफनामे में डीडीए ने बताया कि नरेला सेक्टर ए-10 स्थित पुराने जलकुंड को संरक्षित करने के लिए जून 2025 में टोटल स्टेशन सर्वे (टीएसएस) कराया गया। सर्वे में सामने आया कि कुंड का क्षेत्र लगभग 4.7 हेक्टेयर है और इसमें पानी मौजूद है। यह रिपोर्ट डिप्टी डायरेक्टर (लैंड मैनेजमेंट) को भेजी जा चुकी है, जिससे अतिक्रमण की स्थिति स्पष्ट होगी। डीडीए के अनुसार मौके पर बड़े कब्जे नहीं हैं, केवल कुछ अस्थायी और कच्चे ढांचे हैं, जिन्हें हटाने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। साथ ही कुंड के चारों ओर फैली झाड़ियों, जंगली घास और कचरे को हटाने के लिए सफाई अभियान चलाया गया है, जिसका बड़ा हिस्सा पूरा हो चुका है।
एसटीपी से मिलने वाले ट्रीटेड पानी की गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी मांगी
डीडीए ने हलफनामे में यह भी बताया कि 24 नवंबर 2025 को दिल्ली नमभूमि प्राधिकरण को पत्र लिखकर इस ऐतिहासिक कुंड को नमभूमि घोषित करने का अनुरोध किया है, ताकि इसे नमभूमि नियम 2017 के तहत कानूनी संरक्षण मिल सके। कुंड में पानी की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए 3 दिसंबर 2025 को दिल्ली जल बोर्ड को पत्र भेजकर जीटी करनाल रोड स्थित एसटीपी से मिलने वाले ट्रीटेड पानी की गुणवत्ता से जुड़ी जानकारी मांगी है। डीडीए ने कहा कि सभी काम पर्यावरण नियमों के अनुसार किए जा रहे हैं और जलस्रोतों की सुरक्षा के लिए वह पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, यह कुंड बहुत पुराना
मामला 2025 में एनजीटी में दाखिल हुआ, जहां याचिकाकर्ता राम चंदर भारद्वाज ने कहा कि यह कुंड बहुत पुराना है। राजा चंद के समय में इसे पानी के खेलों के लिए बनाया गया था। लेकिन अब यहां झाड़ियां, कचरा और अवैध कब्जे हैं। कोई कार्रवाई नहीं हो रही, इससे कुंड सूख रहा है। एनजीटी ने इस पर सुनवाई की और डीडीए से जवाब मांगा। डीडीए के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर मनोहर ने हलफनामा दाखिल किया। इसमें डीडीए ने कहा कि वे आरोपों से सहमत नहीं हैं, लेकिन कुंड को सुधारने का काम कर रहे हैं।
कुंड का महत्व क्या है?
यह कुंड नरेला में है, जो दिल्ली के उत्तरी हिस्से में आता है। याचिकाकर्ता ने कहा कि यह राजा चंद का बनवाया हुआ है और पानी के खेलों के लिए इस्तेमाल होता था। अब यह पानी से भरा है, लेकिन कब्जों से खतरा है। डीडीए ने कहा कि कुंड में पानी का स्रोत है, जो भूजल या सतही पानी से आता है। इसे बचाने से दिल्ली में जल संरक्षण, बायोडायवर्सिटी और स्थानीय लोगों को फायदा होगा। पर्यावरण विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे पुराने कुंड बारिश का पानी रोकते हैं और ग्राउंड वॉटर रिचार्ज करते हैं। दिल्ली में बाढ़ और पानी की कमी की समस्या है, ऐसे में यह कुंड उपयोगी साबित हो सकता है।
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