Uttarakhand musical instrument mashkbeen : उत्तराखंड में जब भी कोई शुभ कार्य या शादी-ब्याह का उत्सव होता है, तो हवाओं में एक खास गूंज सुनाई देती है. यह आवाज है ‘मशकबीन’ की, जो आज पहाड़ों की सांस्कृतिक विरासत का एक अटूट हिस्सा बन चुकी है. उत्तराखंड की पहाड़ियों में गूंजने वाली मशकबीन यहां की सांस्कृतिक पहचान और लोकगीतों का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन मशकबीन मूल रूप से उत्तराखंड का वाद्ययंत्र नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें सात समंदर पार हैं.
साल 18वीं और 19वीं सदी में ब्रिटिश सेना के साथ मशकबीन उत्तराखंड पहुंची थीं. स्कॉटलैंड के पहाड़ी सैनिक यानी ‘हाइलैंडर्स’ अपने साथ ‘ग्रेट हाइलैंड बैगपाइप’ लेकर आए थे जिसे मशकबीन कहा गया. चूंकि उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां स्कॉटलैंड के पहाड़ी इलाकों से काफी मिलती-जुलती थीं, इसलिए ब्रिटिश रेजिमेंट में इसे प्रमुखता से शामिल किया गया. धीरे-धीरे यह वाद्ययंत्र सैन्य बैंडों से निकलकर स्थानीय समुदायों तक पहुंचा. रिटायर होकर घर लौटे सैनिकों ने इसे लोक संगीत में शामिल किया. उत्तराखंड के लोगों ने इसे अपनी भाषा में ‘मशकबीन’ या ‘मशकबाजा’ नाम दिया जहां मशक का अर्थ है चमड़े की थैली.

बहुत कम लोग जानते हैं कि पहाड़ों की पहचान बन चुका यह वाद्ययंत्र मूल रूप से भारतीय नहीं है, बल्कि इसका इतिहास सात समंदर पार स्कॉटलैंड की बर्फीली वादियों से जुड़ा है. ब्रिटिश सेना के इन दस्तों के पास संगीत के इस अनूठे उपकरण को बजाने की विशेष दक्षता थी, जिसकी तेज और बुलंद आवाज खुले पहाड़ों में बहुत दूर तक सुनाई देती थी.

उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां स्कॉटलैंड के पहाड़ी इलाकों से काफी मिलती-जुलती थीं. ऊंची चोटियां, गहरी घाटियां और ठंडा मौसम होने के कारण ब्रिटिश सेना को यह वाद्ययंत्र यहां के वातावरण के लिए सबसे उपयुक्त लगा. इसी साम्यता के चलते ब्रिटिश रेजिमेंटों, विशेष रूप से गढ़वाल राइफल्स और कुमाऊं राइफल्स के सैन्य बैंडों में इसे प्रमुखता से शामिल किया गया और यह सेना का एक अहम हिस्सा बन गया.
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स्थानीय स्तर पर इस वाद्ययंत्र को जो नाम मिला, वह इसकी बनावट और काम करने के तरीके पर आधारित था. उत्तराखंड के लोगों ने इसे अपनी भाषा में ‘मशकबीन’ या ‘मशकबाजा’ कहना शुरू किया. इसमें ‘मशक’ शब्द का अर्थ है चमड़े की थैली, जिसमें हवा भरकर पाइपों के जरिए ध्वनि निकाली जाती है. यह नामकरण न केवल सरल था बल्कि स्थानीय लोगों के बीच इसे लोकप्रिय बनाने में भी मददगार साबित हुआ.

मशकबीन का सैन्य छावनियों से निकलकर गांव-गांव तक पहुंचने का श्रेय उन पहाड़ी सैनिकों को जाता है, जो सेना से सेवानिवृत्त होकर अपने घर लौटे. जब ये सैनिक रिटायर होकर वापस आए, तो वे अपने साथ इस वाद्ययंत्र को बजाने का हुनर भी लाए. उन्होंने अपने सामाजिक समारोहों और त्योहारों में मशकबीन का उपयोग करना शुरू किया, जिससे यह धीरे-धीरे सैन्य बैंड से निकलकर लोक संगीत के आंगन तक पहुंच गया.

शुरुआती दौर में मशकबीन का उपयोग केवल कुछ खास अवसरों पर होता था, लेकिन समय के साथ उत्तराखंडी समाज ने इसे पूरी तरह आत्मसात कर लिया. आज कुमाऊं और गढ़वाल की शादियां इसके बिना अधूरी मानी जाती हैं. ढोल-दमाऊ के साथ जब मशकबीन की जुगलबंदी होती है, तो वह एक ऐसा समां बांधती है जो किसी भी श्रोता को झूमने पर मजबूर कर देता है और पहाड़ों की शांति को संगीत से भर देता है.

तकनीकी रूप से यह वाद्ययंत्र काफी कठिन माना जाता है, क्योंकि इसे बजाने के लिए फेफड़ों की जबरदस्त ताकत और सांसों पर नियंत्रण की आवश्यकता होती है. इसके बावजूद, उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों ने इस कला में ऐसी महारत हासिल की है कि आज इसे बजाने वाले कई प्रसिद्ध कलाकार गांवों में मिल जाते हैं. उन्होंने न केवल इसकी धुन को जीवित रखा, बल्कि इसमें पहाड़ी लोकगीतों के तराने भी पिरो दिए हैं. आज मशकबीन केवल एक वाद्ययंत्र नहीं, बल्कि उत्तराखंड के इतिहास और उसकी सैन्य परंपरा का एक जीवंत प्रतीक है.