बेटी की इज्जत के लिए जान दी, अब हम सच के लिए खड़े हैं
अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर एक बार फिर उसके माता-पिता जनता के सामने आए और अपनी पीड़ा, संघर्ष और अधूरे न्याय की कहानी भावुक होते हुए शेयर की. तीन साल बीत जाने के बाद भी जिस सवाल का जवाब नहीं मिला, वही सवाल आज भी उनकी लड़ाई की वजह है. आखिर वो वीआईपी कौन था, जिसकी वजह से अंकिता की हत्या कर दी गई?
अंकिता के पिता वीरेंद्र भंडारी ने भावुक होते हुए कहा, मैं सबसे पहले उत्तराखंड की पूरी महिला शक्ति और पूरे भारत की जनता को धन्यवाद देना चाहता हूं। आप लोगों की वजह से ही आज मैं यहां तक पहुंचा हूं। हमारी शुरू से ही यही मांग रही है कि मेरी बेटी के साथ जो गलत हुआ, उसका पूरा सच सामने आए. मैं तो दिल्ली जा रहा था, तभी अचानक मुख्यमंत्री से मिलने का कार्यक्रम बना. दोपहर करीब 1:45 बजे हम घर से निकले और शाम करीब 6:30 बजे देहरादून पहुंचे.
कैसे पहुंचे देहरादून?
देहरादून आने को लेकर उठे सवालों पर अंकिता के पिता ने साफ किया कि पौड़ी से मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से गाड़ी की व्यवस्था की गई थी. कार से ही मैं यहां आया. हमने सीएम के सामने दो मांगे रखीं. हम दोनों की शुरू से ही मांग थी कि सीबीआई की जांच हो और हमारे पूरे उत्तराखंड की जनता भी यही चाहती है कि सीबीआई की जांच हो. सीबीआई वीआईपी की जांच करें. कौन है वो वीआईपी जिसकी वजह से ही मेरी लड़की की हत्या की गई.
उन्होंने आगे कहा कि हमें अभी तक नहीं पता कि आखिर ऐसी क्या वजह थी, जिसकी वजह से मेरी बेटी की हत्या कर दी गई. वो वीआईपी कौन था. इसकी जांच सीबीआई करे. सीबीआई की जांच सुप्रीम कोर्ट जज की निगरानी में हो. जिस समय हम मुख्यमंत्री से मिले तब उनके अलावा कमिश्नर, डीजीपी और दो तीन अन्य कर्मचारी मौजूद थे.
मुख्यमंत्री के सामने रखी दो अहम मांगें
वीरेंद्र भंडारी ने बताया कि मुख्यमंत्री से मुलाकात में उन्होंने दो मुख्य मांगें रखीं-
सीबीआई जांच
वीआईपी की भूमिका की जांच
वीरेंद्र भंडारी ने कहा कि उनकी बेटी अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन मैं उन बेटियों के लिए लड़ूंगा, जो पढ़ने-लिखने और नौकरी करने बाहर जाने का सपना देखती हैं.
मां का दर्द- मेरी बेटी का कसूर क्या था?
अंकिता की मां सोनी देवी अपने आंसू नहीं रोक पाईं. उन्होंने रोते हुए कहा, मैंने मुख्यमंत्री से यही कहा कि जिस वजह से मेरी बेटी की जान गई, उस आरोपी को हमारे सामने रख दो. मेरी बेटी का कसूर क्या था? हर मां–बाप अपने बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए बाहर भेजते हैं. इसका मतलब ये थोड़ी है कि कोई रसूखदार उनके साथ कुछ भी कर ले. मुझे पता है कि मेरी बेटी कभी लौटकर नहीं आएगी. मुझे बहुत दुख होता है, लेकिन फिर भी मैं अपनी बेटी के लिए आज तक लड़ रही हूं.
आगे कहा कि परिवार ने जो कष्ट झेला है, वो शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. हम अपने घर को संवार भी नहीं सकते, लेकिन हम उन बच्चियों के लिए खड़े हैं, जो नौकरी करने बाहर जाएंगी. उनकी सुरक्षा कैसी होगी यही हमारी चिंता है. उन्होंने यह भी कहा कि अगर हम आज खड़े नहीं हुए, तो कल किसी और की बेटी के साथ वही होगा, जो मेरी बेटी के साथ हुआ.
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